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श्री रुद्राम्बिका महायज्ञ में उमड़ा आस्था का सैलाब, यज्ञ मंडप की परिक्रमा को पहुंचे सैकड़ों श्रद्धालु

गाजीपुर। श्री रुद्राम्बिका धाम परिसर में चल रहे श्री रुद्राम्बिका महायज्ञ एवं श्रीराम कथा के क्रम में मंगलवार को विशेष यज्ञ आहुति का आयोजन हुआ। यज्ञ मंडप की परिक्रमा और आहुति में शामिल होने के लिए नौली, उत्तरौली सहित आसपास के क्षेत्रों से सैकड़ों श्रद्धालु श्री रुद्राम्बिका धाम परिसर पहुंचे। देखते ही देखते मंदिर परिसर श्रद्धालुओं से खचाखच भर गया। मनोकामना पूर्ति की कामना लेकर पहुंचे श्रद्धालुओं ने विधि-विधान के साथ यज्ञ मंडप की परिक्रमा की। इस दौरान पूरा परिसर वैदिक मंत्रोच्चार और जयघोष से गुंजायमान रहा। श्रद्धालु ‘‘यज्ञ भगवान की जय’’, ‘‘काली मइया की जय’’, ‘‘रुद्राम्बिका माई की जय’’, ‘‘गंगा मइया की जय’’ और ‘‘सनातन धर्म की जय’’ के जयकारे लगाते रहे। काशी से पधारे विद्वान आचार्यों द्वारा वेदोक्त विधि-विधान से यज्ञ में हवन और आहुतियां समर्पित कराई गईं। वैदिक मंत्रों की गूंज से आसपास का पूरा क्षेत्र भक्तिमय हो उठा। यज्ञाचार्य डॉ. पंडित धनंजय पांडे ने यज्ञ की महत्ता पर प्रकाश डालते हुए कहा कि यज्ञ भारतीय सनातन परंपरा में केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि व्यक्ति और समाज के संस्कारों को परिष्कृत करने का एक सशक्त माध्यम रहा है। उन्होंने कहा कि यज्ञ में समर्पित आहुतियों से उत्पन्न धूम्र वातावरण में फैलता है और इसका प्रभाव मनुष्य की मनोभूमि को सकारात्मक एवं परिष्कृत बनाने में सहायक माना गया है। यज्ञ की परंपरा में प्रकृति, जीव-जंतुओं और समस्त सृष्टि के कल्याण की भावना निहित है। उन्होंने कहा कि समाज में सुसंस्कारिता और सद्भाव की स्थापना के लिए यज्ञ की परंपरा का विशेष महत्व है। प्राचीन काल में राजा-महाराजा भी महत्वपूर्ण और शुभ कार्यों से पूर्व यज्ञ-अनुष्ठान करते थे। डॉ. पांडे ने कहा कि यज्ञ का उद्देश्य केवल बाहरी वातावरण को शुद्ध करना नहीं, बल्कि मनुष्य की अंतःचेतना को भी संस्कारित करना है। मनुष्य के भीतर लंबे समय से जमा नकारात्मकता, विकार और मलिनता को दूर कर उसकी मनोभूमि को सकारात्मक, उत्कृष्ट और उज्ज्वल बनाने में आध्यात्मिक साधना की महत्वपूर्ण भूमिका है।

श्रीराम कथा ने दिया मर्यादा और संस्कार का संदेश

महायज्ञ के क्रम में शाम दो बजे से श्री रुद्राम्बिका धाम परिसर में श्रीराम कथा का भी आयोजन हुआ। कथा व्यास आचार्य पंडित विजय कौशिक जी महाराज ने श्रीराम के चरित्र और उनके आदर्श जीवन पर प्रकाश डालते हुए कहा कि भगवान श्रीराम को मर्यादा पुरुषोत्तम इसलिए कहा जाता है क्योंकि उन्होंने अपने जीवन के प्रत्येक चरण में मर्यादा, कर्तव्य, त्याग और धर्म का पालन किया। उन्होंने कहा कि श्रीराम का जीवन केवल धार्मिक आस्था का विषय नहीं, बल्कि मानव जीवन के लिए आदर्शों और संस्कारों का मार्गदर्शन भी करता है। श्रीराम ने अपने आचरण के माध्यम से यह संदेश दिया कि गृहस्थ जीवन भी संयम, प्रेम, कर्तव्य, सत्य और सात्विक विचारों के साथ जिया जाए तो वह स्वयं में साधना का रूप बन सकता है। आचार्य पंडित विजय कौशिक जी महाराज ने कहा कि परिवार समाज की पहली पाठशाला है। यदि परिवार में सत्य, संस्कार, परस्पर सम्मान, सेवा और सद्भाव की भावना विकसित होती है तो उसका सकारात्मक प्रभाव पूरे समाज पर पड़ता है। श्रीराम कथा मनुष्य को अपने कर्तव्यों का बोध कराने के साथ-साथ विपरीत परिस्थितियों में धैर्य, संयम और धर्म के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देती है। उन्होंने कहा कि आज के समय में जब मनुष्य तनाव, असंतुलन और आपसी मतभेदों से घिरा हुआ है, ऐसे समय में श्रीराम के आदर्शों से प्रेरणा लेकर जीवन में संयम, मर्यादा और सकारात्मक सोच को स्थान देना अत्यंत महत्वपूर्ण है। श्रीराम कथा का श्रवण व्यक्ति को अपने आचरण पर विचार करने और जीवन को बेहतर दिशा देने की प्रेरणा देता है। कार्यक्रम के दौरान श्रद्धालु देर तक कथा का श्रवण करते रहे। पूरे परिसर में भक्ति और आध्यात्मिक वातावरण बना रहा। कार्यक्रम को सफल बनाने में बबुआ सिंह, गोविंद पांडे, विशेष त्रिपाठी, रास बिहारी सिंह, सीताराम पुजारी, अखिलेश पांडे, संतोष सिंह, श्याम बिहारी यादव, बृजेश पांडे, हृदय नारायण सिंह, विद्यानंद सिंह, संतोष पांडे, अशोक सिंह  कृष्णानंद चौधरी व कृष्णानंद यादव सहित अन्य श्रद्धालुओं एवं सहयोगियों का सराहनीय योगदान रहा।

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