गाजीपुर। आचार्य नरेंद्र देव कृषि एवं प्रौद्योगिक विश्वविद्यालय कुमारगंज, अयोध्या के अंतर्गत संचालित कृषि विज्ञान केंद्र आंकुशपुर गाजीपुर द्वारा दिनांक 17 जून 2026 को खेत बचाओं अभियान 2026 के तहत कृषि विज्ञान केंद्र पर गौ आधारित प्राकृतिक खेती पर एक दिवसीय प्रशिक्षण का आयोजन किया गया। यह प्रशिक्षण कार्यक्रम गाजीपुर जनपद के जिलाधिकारी अनुपम शुक्ला की अध्यक्षता में हुआ जिसमें मुख्य विकास अधिकारी अलोक प्रसाद, उप निदेशक कृषि विजय कुमार, केंद्र के वरिष्ठ वैज्ञानिक एवं अध्यक्ष डॉ. राम गोपाल, केंद्र वैज्ञानिक डॉ. नरेंद्र प्रताप (पादप प्रजनन), डॉ. शशांक सिंह (उद्यान), डॉ. दीपक प्रजापति (मृदा विज्ञान), डॉ. पंकज कुमार (कृषि अभियांत्रिकी) एवं केंद्र के समस्त कर्मचारी उपस्थित रहें। चयनित प्रगतिशील कृषकों को जिलाधिकारी द्वारा धान एवं ढैंचा (हरी खाद ) की उन्नत प्रजाति के बीजों का वितरण किया गया। इस कार्यक्रम में कुल 36 प्रगतिशील कृषक एवं कृषक महिलाओं ने प्रतिभाग किया। वैज्ञानिकों ने किसानों को विस्तार से बताया कि प्राकृतिक खेती न केवल फसलों के लिए बल्कि हमारी मिट्टी की सेहत के लिए भी एक वरदान साबित हो रही है। प्राकृतिक खेती अपनाने वाले क्षेत्रों की मिट्टी में जीवांश कार्बन में बढ़ोतरी देखी गई है। आधुनिक खेती में रसायनों के बढ़ते प्रयोग के बीच कृषि वैज्ञानिकों ने एक बार फिर गोबर की खाद को मिट्टी के स्वास्थ्य के लिए सबसे जरूरी बताया है। गोबर की खाद का सही इस्तेमाल न केवल फसल की पैदावार बढ़ाता है, बल्कि खेती की लागत को भी जीरो बजट पर ला सकता है। गोबर की खाद मिट्टी के कणों को आपस में बांधकर रखती है। इससे रेतीली मिट्टी की जलधारण क्षमता बढ़ती है और चिकनी मिट्टी में हवा का संचार बेहतर होता है। गोबर की खाद के इस्तेमाल से मिट्टी भुरभुरी बनती है, जिससे पौधों की जड़ें गहराई तक जा पाती हैं। डॉ0 दीपक प्रजापति (मृदा वैज्ञानिक), ने किसानों को केंचुआ खाद, कम्पोस्ट को मिट्टी में मिलाने से होने वाले लाभ के बारे में बिस्तार से बताया। फसलों में निरन्तर अन्तराल पर जीवामृत का छिड़काव करने से कीटों का प्रकोप कम हो जाता है और मृदा का स्वास्थ्य बना रहता है I जैविक बीज तैयार करने की पूरी प्रक्रिया समझाई। किसानों को अवगत भी कराया कि आज के दौर में कृषि और पशुपालन को अलग-अलग करके देखना न केवल आर्थिक नुकसान का सौदा है बल्कि यह मिट्टी की सेहत के लिए भी चिंताजनक है। खेती की बढ़ती लागत और रसायनों के अंधाधुंध प्रयोग ने मृदा स्वास्थ्य को गंभीर संकट में डाल दिया है, जिसका सीधा असर पशुओं के स्वास्थ्य और दूध की गुणवत्ता पर पड़ रहा है। अगर हमें आने वाली पीढ़ियों के लिए जमीन को बचाना है तो हमें मिट्टी को रसायन-मुक्त बनाना ही होगा। प्राकृतिक खेती ही वह रास्ता है जिससे लागत कम और मुनाफा ज्यादा होगा।
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