गाज़ीपुर! निवासी डॉ. आनंद कुमार सिंह की काव्य-साधना ने हिंदी भाषा और साहित्य को नई ऊँचाइयाँ प्रदान की हैं। विदित हो कि प्रो. आनंद कुमार सिंह की प्रसिद्ध काव्यकृति “अथर्वा : मैं वही वन हूँ” साहित्य अकादमी पुरस्कार 2025 की विचारणीय सूची में शीर्ष स्थान पर रही है। इस कृति को पूर्व में उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान लखनऊ द्वारा “तुलसी सम्मान” तथा मध्य प्रदेश साहित्य अकादमी भोपाल द्वारा “अखिल भारतीय अटल बिहारी वाजपेयी सम्मान” से पुरस्कृत किया जा चुका है।इस कृति पर देश के अनेक विश्वविद्यालयों में शोध कार्य संचालित हैं और एक शोधकार्य प्रकाशित भी हो चुका है। साथ ही कई प्रमुख आलोचकों ने इस पर स्वतंत्र पुस्तकें भी लिखी हैं। यह भी उल्लेखनीय है कि मध्य प्रदेश राष्ट्रभाषा प्रचार समिति की प्रतिष्ठित पत्रिका “अक्षरा” ने इस काव्य पर एक विस्तृत विशेषांक प्रकाशित किया था, जिसमें देश के शीर्षस्थ आलोचकों के लेख संकलित हैं। प्रसिद्ध साहित्यकार अशोक वाजपेयी ने इंडिया इंटरनेशनल सेंटर दिल्ली में इस पुस्तक के विमोचन समारोह में अध्यक्ष की हैसियत से बोलते हुए कहा था कि भाषा में कविता का एक काम यह है कि वह हमें वहाँ ले जाए जहाँ पहले कभी कविता न गई हो, न कभी भाषा गयी हो। इस पुस्तक की एक प्रशस्ति यह हो सकती है कि इसने कविता और भाषा दोनों को वहाँ ले जाने की कोशिश की है, जहाँ कम से कम पिछले पचास वर्षों में हिंदी कविता नहीं गई थी, और जहाँ जाने में उसे झिझक रही है।” इस पुस्तक की विशिष्टता को देखकर देश के अनेक विश्वविद्यालयों ने कृति के रचनाकार डॉ आनंद सिंह का व्याख्यान कराया था जिनमें पांडिचेरी विश्वविद्यालय, त्रिपुरा विश्वविद्यालय, बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय, सागर विश्वविद्यालय और हैदराबाद विश्वविद्यालय महत्वपूर्ण हैं। प्रो. आनंद कुमार सिंह की एक अन्य महत्वपूर्ण काव्यकृति विवेकानंद पिछले वर्ष प्रकाशित हुई, जो सूर्यकांत त्रिपाठी निराला की चुनौतीपूर्ण रचना “तुलसीदास” के विशिष्ट एवं जटिल छंद-विन्यास की परंपरा में सफलतापूर्वक रची गयी है।

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