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लगाएं लाही (तोरिया) की फसल, कम समय में पाएं उत्‍पादन- प्रो. रवि प्रकाश मौर्य  

गाजीपुर। लाही (तोरिया) की खेती लाभकारी: प्रो. रवि प्रकाश मौर्य निदेशक प्रसार्ड ट्रस्ट मल्हनी भाटपार रानी देवरिया लाही (तोरिया) की खेती एक बेहद कम अवधि  में तैयार होने वाली  तिलहनी फसल है, जिसे खरीफ और रबी फसल के बीच कैच क्रॉप के रूप में उगाया जाता है।  किसी कारण से धान या अन्य खरीफ की फसल जो किसान नही ले पाये हो वैसे खाली खेत में तोरिया की बुआई कर सकते है।

बुवाई का समय और उपयुक्त जलवायु- तोरिया की बुवाई के लिए सितंबर  का समय सबसे अच्छा माना जाता है।इसके पौधों के विकास के लिए 25 से 30 डिग्री सेल्सियस तापमान सबसे अनुकूल होता है।

खेत की तैयारी और मिट्टी- तोरिया हल्की दोमट या रेतीली-दोमट मिट्टी में आसानी से उगाया जा सकता है। खेत की पहली जुताई मिट्टी पलटने वाले हल से करें और इसके बाद दो से तीन जुताई कल्टीवेटर या रोटावेटर चलाकर पाटा लगा लें ताकि मिट्टी भुरभुरी और समतल हो जाए।

उन्नत किस्में- (उत्तर प्रदेश के लिए)

उत्तरा( पी. टी. 2002-25),

तापेश्वरी, पंत तोरिया-508,

पीटी-303, आजाद चेतना ( टी. के. एम.-14-02)

बीज की मात्रा और बुवाई का तरीका-

प्रति एकड़ लगभग 1.5  किलोग्राम बीज पर्याप्त होता है।

कतार से कतार की दूरी 30 सेंटीमीटर (1 फीट) रखनी चाहिए। बीज की बुवाई 2 से 3 सेंटीमीटर से अधिक गहराई पर नहीं करनी चाहिए।

सिंचाई प्रबंधन- यदि आवश्यकता हो तो पौधे जमने के बाद हल्की सिंचाई या फव्वारा विधि का उपयोग करें, क्योंकि सीधे अधिक पानी देने से फसल को नुकसान हो सकता है। फूल निकलने से पूर्व की अवस्था पर  जल की कमी के प्रति तोरिया विशेष संवेदनशील है इस अवस्था में सिंचाई अवश्य करना चाहिए। खाद एवं उर्वरक- मृदा परीक्षण के आधार पर उर्वरक का प्रयोग करना चाहिए। यदि मृदा परीक्षण न हो सके तो 16 कुन्टल गोबर की सड़ी खाद बुआई  से पहले प्रति एकड़ की दर से खेत में डालकर मिला दें।, 32 किग्रा. नत्रजन,  20 किग्रा. फास्फोरस,20 किग्रा. पोटाश की आवश्यकता प्रति एकड़ होती है। जिसके लिये  35 किग्रा यूरिया, 125 किग्रा. सिंगल सुपर फास्फेट,33 किग्रा म्यूरेट आफ पोटाश, तथा 80 किग्रा  जिप्सम गंधक की पूर्ति हेतु बुआई के समय खेत में डालें। शेष  35 किग्रा. यूरिया की मात्रा 25-30 दिन बाद पहली सिंचाई के बाद डालें।

उपज और लाभ-लाही की फसल करीब 80 से 90 दिनों में पक कर तैयार हो जाती है।प्रति एकड़ लगभग 4 से 7 क्विंटल तक का उत्पादन मिल जाता है। इसमें 40 से 45% तक तेल की मात्रा होती है, और इसके बाद खेत समय से खाली हो जाने पर किसान आसानी से गेहूं की पछेती या समय पर बुवाई कर सकते हैं।

 

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