उबैदुर्रहमान
गाजीपुर। क़स्बा युसूफपुर क़े अंसारी साहिबान क़े बेहतरीन आम क़े बागो क़े बारे मे गाज़ीपुर क़े शायर – अंजुमन गाज़ीपुरी ने 1920 मे – “शोहरत हर तरफ गाज़ीपुर के आम की ” लिखी है. जनपद मे जिनके जिनके पास बेहतरीन आमो क़े बाग थे, उनका भी उल्लेख है. ज़िला गाज़ीपुर क़े भूमिहार, राजपूत, ब्राह्मण तथा कायस्थ बिरादरी क़े बड़े बड़े बेहतरीन किस्म क़े आम क़े बाग लगे थे. जहाँ उच्चकोटी क़े आम अन्य जनपदों से लाकर लगाय गए थे. उसी तरह क़ासिमबाद, ज़हुराबाद, भितरी, सैदपुर, करंडा, शादियाबाद, बहरियाबाद क़े साथ शहर गाज़ीपुर मे बड़ी आरज़ियों मे नायाब किस्मो क़े आम क़े बाग़ थे. पहले क़े लोग शौक़ीन थे और वे नई नई कलम लाकर लगाते थे और उनकी देखभाल क़े लिए कारिंदे रखे जातें थे, जो साफ सफाई और पानी देना का काम करते थे. शहर मे तो बाकायदा एक इलाका आम घाट है। कुछ बेहतरीन आमो क़े नामो मे एक आम्रपाली, बंगापल्ली, अल्फांसो, केसर, तोतापुरी, फज़ली, मल्लिका, सफेदा, दशहरी,नीलम परी, चौसा, लंगड़ा,हिमसागर, चुसवा, किशन भोग, रसपुरी, ज़र्दालू, गुलाब खास, समर बहिश्त आदि थे, जिनकी पैदावार बहुत थी. लोग तोहफा मे एक दूसरे क़े यहाँ भेजते थे लेकिन अब ऐसा नहीं है. अधिकतर पेड़ काट कर वहाँ नई नई बस्तियाँ आबाद हो गई है। हमारे जनपद के आम अपनी शीरीनी और खुशबूदार महक की वजह से मशहूर थे – किसी ने संरक्षित क़े लिए इस ओर धयान नही दिया और ना ही यहाँ क़े लेखकों और शायरों ने इस विषय पर भी नही लिखा है? जबकि आम की खासियत पर मिर्ज़ा ग़ालिब और अकबर इलाहाबादी लिख चुके। उर्दू क़े एक शायर अंजुम ग़ाज़ीपुरी ( 1891 – 1962 ) हुए है – जिनका यह मजमूय कलाम ( काव्य संग्रह ) है उनका असल नाम शेख़ ज़ाकिर हुसैन जो मुहल्ला बरबरहना के रहने वाले है. उन्ही का वहाँ एक अंजुम प्रेस था. अब यह नहीं रहा। शायरों के साथ साहित्यकारों की किताबो एवं रिसालों(पत्रिकाएँ ) के साथ साप्ताहिक समाचार पत्र ” अनीसुल-हिन्द ” निकालते है और मुफ्त में बांटते हैं – जिसमे होरहे स्वतंत्रता आंदोलनों – सियासी लोगो को जेल मे डाला जाना, बड़े लोगो की कहानी किस्से, तारीखी ईमारतों – मठ, मस्जिद, मंदिर और खानकाह क़े बारे मे छपता था. यह अकेला अख़बार था जो 8 पृष्टों का था. यह जनपद क़े कोने कोने लोगो क़े पास जाता था. जो इस अख़बार को निरंतर प्रकाशित करते थे – खुद शायर भी थे अंजुम ग़ाज़ीपुरी साहब का काव्य संग्रह – 210 पृष्टों पर है, जिसकी छपाई बेहद उम्दा और साफ है। जो उन्ही के प्रेस से छपी है। उनके उस्तादों में काशिफ लखनवी , आसी ग़ाज़ीपुरी और मौलाना हाली पानीपती थे। पृष्ठ 7 पर गाज़ीपुर के आमों का बखान किया है इनकी ख़ासियतें क्या क्या रही है है। इसका शीर्षक ” मसनवी समर बहिश्त ” है। यह दो भागों में विभाजित है। प्रथम हिस्से में मिर्ज़ा ग़ालिब , ज़ौक़ देहलवी और दाग देहलवी को आम खाने का शौक़ कितना था, लिखा है। उस समय इन तीनो उर्दू के शलाका शायरों के कई हमारे जनपद में शागिर्द थे जिनका इनसे मिलना जुलना होता था।
इसके दूसरे भाग में –
गाज़ीपुर ज़िले के आमो का उल्लेख है कि यहां आम की किस्म है – किस एरिया का कौन सा आम उम्दा किस्म का है और उसकी कुआलिटी ऐसी कि खाने क़े बाद मुंह से खुशबू आए है। पढ़ने में थोड़ी मुश्किल होगी – इतना है कि आप भाव समझ सकते है। यहाँ इस लम्बी नज़्म क़े कुछ बन्द दिलचस्पी क़े लिए शेयर कर रहा हूं कि यहाँ क़े शायर क्या क्या लिख छोड़ा है।
कोयलों की पुकार शाखों पर
कोंपलों की बहार शाखों पर
शाखे आरास्ता दुल्हन की तरह
पत्ता पत्ता दिल चमन की तरह
डालियों का सिंघार किया क हना
रौनके बर्गो – बहार का किया कहना
चश्मे गुलशन है बारे आम का बाग़
चश्मे बददूर ( आम का नाम ) सारे गुहर का चिराग
लँगड़ा है बादशाह आमो का
रश्के तैमूर लंग है गोया
या जहांगीर शाह हिन्दुस्तां
और मिठवा ( आम ) ज़बां नूरजहां
अब्र है सर पर और रहमत आम
साकिया पहले आम बादहु जाम
खूबसूरत हसीन माह जबीं
देसी सेंदुरिए ( आम ) जो हों शीरीं
हों तो खुशरंग और शीरीं हों
आज दे कल दे या हमें परसों
दस दसहरी ( आम ) कुछ आफताब तबक(चमकता सूरज )
अच्छे खुशरंग जैसे गुल के वरक़
दिल की क़ाशे हैं उसकी काशें सब
चहरा आफत तो रंग चहरा ग़ज़ब
खूब खाते है अहले युसुफपुर
है पसंद उनको सूरतें अंगूर
छुरियों से काँटते तराशते है
क़ाशे कहती है उनकी वाह रे मैं
मह ( आम ) से मुश्क हो लिया है अंजुम
कच तो है लफ्ज़ खाम सूरत दम
फजरी ( आम ) का वक़्त अंजुम आ ही गया
होगयी शाम मदहे ताबा कुजा
होगये आम सुबह के तारे
सूए देहली कभी जो जाएंगें
क़ब्र ग़ालिब पे पढ़ सुनाएँगें
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