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पीजी कालेज गाजीपुर में “लिविंग इन द हार्मनी” विषय पर संगोष्‍ठी संपन्‍न

गाजीपुर। पी.जी. कॉलेज, गाज़ीपुर के अंग्रेज़ी विभाग में “लिविंग इन द हार्मनी” विषय पर एक अकादमिक संगोष्ठी का आयोजन किया गया। इसके मुख्य वक्ता पर्यावरण विभाग, बी.एच.यू. के प्रोफेसर पी.सी. अभिलाष थे तथा अध्यक्षता अंग्रेज़ी विभागाध्यक्ष प्रोफेसर रविशंकर सिंह ने की। संगोष्ठी का संचालन डॉ. रामनारायण तिवारी ने किया। कार्यक्रम की शुरुआत प्रोफेसर पी.सी. अभिलाष के स्वागत से हुई, जिसे अंग्रेज़ी विभाग के विद्यार्थी एवं युवादर्द पत्रिका के संपादक असितांग कुमार सिंह ने संपन्न किया। विषय को आगे बढ़ाते हुए प्रोफेसर पी.सी. अभिलाष ने कहा कि प्रकृति के सभी प्राणी दो भागों में बाँटे जा सकते हैं—एक वे जो प्रकृति के विधि-विधान के अनुरूप सामंजस्य स्थापित करते हैं, और दूसरे वे जो प्रकृति को अपनी इच्छा के अनुसार ढालना चाहते हैं। दूसरी श्रेणी में उन्होंने मनुष्य को रखा, जो लोभ, लालच और इच्छाओं के वशीभूत होकर प्रकृति का शोषण करता है। उनके अनुसार वर्तमान समय में मनुष्य की यही प्रवृत्ति पर्यावरण संकट का मुख्य कारण है, जिसके परिणामस्वरूप पर्यावरण की स्थिति दिन-प्रतिदिन बिगड़ती जा रही है। प्रोफेसर अभिलाष ने इस विषय-वस्तु का प्रस्तुतीकरण पीपीटी के माध्यम से विस्तारपूर्वक किया। निस्संदेह व्याख्यान विवरणात्मक था, किंतु इसकी कार्यप्रणाली अन्वेषण और समालोचनात्मक विश्लेषण पर आधारित प्रेरणात्मक (इंडक्टिव) थी, जिसके माध्यम से उन्होंने समस्याओं के समाधान प्रस्तुत करने का प्रयास किया। उनका कहना था कि यदि मनुष्य यह स्वीकार कर ले कि प्रकृति केवल मनुष्य के लिए नहीं है, बल्कि मनुष्य भी प्रकृति के लिए बना है, तो समस्या का समाधान सहज रूप से संभव है। उनके अनुसार मनुष्य को स्वयं पर नियंत्रण रखना चाहिए और प्रकृति को उसके स्वाभाविक ढंग से कार्य करने देना चाहिए। इसके बाद प्रश्नोत्तर सत्र आरंभ हुआ, जिसमें  ईशी राय, सुधांशु पांडेय, आशीष पांडेय, गौरव दुबे, असितांग कुमार सिंह, अंजलि सिंह तथा काज़ी फ़रीद आलम ने प्रश्न पूछे। प्रोफेसर अभिलाष ने सभी प्रश्नों के उत्तर देते हुए साहित्य में पर्यावरणीय समस्याओं की ओर छात्रों का ध्यान आकर्षित किया और उन्हें समझाया। संगोष्ठी के अंत में कॉलेज के प्राचार्य प्रोफेसर राघवेंद्र पांडेय ने प्रतिभागियों को अपने करकमलों से प्रमाणपत्र वितरित किए तथा कार्यक्रम का समापन किया।

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