गाजीपुर। सनातन धर्म के मंदिरों में धर्म ध्वजा स्थापित करने का पौराणिक महत्व रहा है। जन्माष्टमी के पर्व पर सिधौना स्थित सिद्धनाथ महादेव धाम के शिखर पर विधिवत पूजा पाठ कर स्वर्ण कलश सहित त्रिशूल स्थापित किया गया। कुछ माह पूर्व आंधी में पुराना कलश शिखर टूट कर गिर गया था। काशी रंगमंच कला परिषद की ओर से पंच कलश संग त्रिशूल करीब साढ़े छह फीट ऊंचा कलश शिखर लगाया गया। आयुष राज्यमंत्री डॉ दयाशंकर मिश्रा ने कलश पूजन करते हुए कहा कि शिखर दर्शन पाप नाशनम अर्थात अगर किसी वजह से आप मंदिर में भगवान की प्रतिमा के दर्शन करने न जाएं तो उसके शिखर के दर्शन करने से ही आपके पाप नष्ट हो जाते है। इसीलिए हर शिवालय सहित सनातनी मंदिर में शिखर अवश्य होता है। कला परिषद के अध्यक्ष कृष्णानंद सिंह ने बताया कि मंदिर का वास्तुशिल्प ऐसा होता है। जिससे वहां पवित्रता, शांति और दिव्यता बनी रहती है। मंदिर की छत पर गुम्बद ध्वनि सिद्धांत को ध्यान में रखकर बनाई जाती है। शिखर के केंद्र बिंदु के ठीक नीचे मूर्ति प्रतिष्टित होती है। गुंबद के कारण मंदिर में किए जाने वाले मंत्रों के स्वर और अन्य ध्वनियां गूंजती हैं तथा वहां उपस्थित व्यक्ति को प्रभावित करती है। गुंबद और मूर्ति का केंद्र एक ही होने से मूर्ति में निरंतर ऊर्जा प्रवाहित होती रहती है। जब हम उस मूर्ति को स्पर्श कर उसके आगे सिर टिकाते हैं। तो हमारे अंदर भी वह ऊर्जा प्रवेश कर ऊर्जा से शक्ति, उत्साह और प्रसन्नता का संचार करता है। श्रीकृष्ण जन्माष्टमी पर रातभर भजन कीर्तन चलता रहा। शिवाजी मिश्रा, डॉ रामजी सिंह, नंदलाल मिश्रा, करुणाशंकर मिश्रा, रामबरत सिंह, शिवशंकर सिंह, भवानी शरण, केशव सिंह रहे।
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