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अरहर की खेती किसान एवं मृदा दोनों के लिए के लिए लाभकारी

गाजीपुर। वर्तमान मानसून में अबतक हुए औसत वर्षा खरीफ के मौसम को अरहर की खेती के लिए अनुकूल परिस्थितियों का निर्माण कर रही है| इस समय बोयी जाने वाली अरहर की प्रजातियाँ जैसे एम.ए. 6 (मालवीय विकास), मालवीय चमत्कार, एन.ए.-2, आई.पी.ए.-203, आई.पी.ए. 206, पूसा अरहर -151 आदि है जो 230 से 250 दिनों में तैयार हो जाती है | उक्त जानकारी आचार्य नरेन्द्र देव कृषि एवं प्रौद्योगिक विश्वविद्यालय कुमारगंज अयोध्या के कार्यक्षेत्र गाजीपुर में स्थित कृषि विज्ञान केन्द्र के कृषि वैज्ञानिक डॉ नरेन्द्र प्रताप ने दिया | डॉ नरेन्द्र ने अरहर के महत्त्व के बारे में जनपद कृषकों को जानकारी देते हुए कहा कि दलहनी फसल होने कारण इन फसलों की जड़ों पर स्थित गांठो में राइजोबियम बैक्टीरिया पायी जाती है जो वायुमण्डल में उपस्थित गैसीय नाइट्रोजन का स्थिरीकरण मृदा में करके फसलों के लिए उपलब्ध करता है | जिससे हमारी यूरिया पर निर्भरता कम हो जाती है | अरहर की अच्छी उपज के लिए फास्फोरस युक्त उर्वरकों जैसे सिंगल सुपर फास्फेट, डाई अमोनियम  फास्फेट का उपयोग अधिक लाभकारी होता है | डॉ प्रताप ने किसानो को जानकारी प्रदान करते हुए कहा कि बुवाई से पहले बीज को अवश्य उपचारित करना चाहिए; इसके लिए एक ग्राम कार्बेन्डाजिम के साथ 10 ग्राम दलहनडर्मा फार्मुलेशन  अथवा चार ग्राम ट्राईकोडर्मा  और एक ग्राम कर्बोक्सील कार्बेन्डाजिम से उपचारित करें | उपचारित करने के बाद एक पैकेट राइजोबियम कल्चर का पानी में घोल तैयार कर उपचारित बीज (10 किग्रा बीज के लिए)  के ऊपर छिड़कर मिला देते हैं और शाम के समय बुवाई कर देते हैं |  इस प्रकार से उपचारित बीज की बुवाई करने से अरहर में लगाने वाली कई प्रकार के बिमारियों पर नियंत्रण कर अधिक से अधिक उत्पादन प्राप्त कर किसान अपने आप आर्थिक रूप से समृद्ध साथ ही मृदा के स्वाथ्य को संरक्षित कर सकता है।

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