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था एक चराग जो बुझ गया – सरवत महमूद साहब

उबैदुर्रहमान सिद्दीक़ी

गाजीपुर। ज़िन्दगी मे मेरी कुछ खूबसूरत और दरयादिल लोगों से मुलाक़ातें हुई हैँ. उनमे क़स्बा बारा के एक सरवत महमूद खान साहब भी हैँ. बहते पानी की तरह उन्हें शीतल पाया. शख्शियत मे गज़ब कि कशिश थीं. अपनी एक मुलाक़ात मे ही मुझे अपना दीवाना बना डाला.अक्सर उनसे बातें होती. फ़ोन कर के मेरी खैरयत लेते. अपने दुख दर्द साझा करते. कुछ खट्टी कुछ मीठी यादों के क़िस्से सुनाते.अपनी जवानी के दिनों के भी रहते.. कभी अपनी विदेश यात्राओं के ज़िक्र को छेड़ देते. अपनी मेहनत कश ज़िन्दगी के उतार चढाव से होकर पोख्ता इंसान बने, उन्हें ब्यान करते. मैं चुपचाप उन्हें सुनता रहता. फिर सोचता कि यह मेरे अब्बा की उमर वाले और मैं काफ़ी छोटा, क्या समझकर दोस्ती की कि मुझे ऐसा अपना राज़दार बना डाला? इसी उधेड़ बिन मे मैं रहता और फिर आवाज़ आती ” उबैद भाई आज मेरा कुछ दिल हलका हो गया. आप से जब जब बात होती हैँ तो ना जाने क्यूँ महसूस होता हैँ कि कोई अपना हैँ जिससे कुछ कह सकता हूँ, सही मशवरा मिल जाता हैँ. दिल मुत्माइन हो जाता हैँ. ” सरवत महमूद साहब की लोगों ने कद्र नही की. वह बेहद अच्छी सोच समझ के साथ कौम की फिक्र वाले इंसान थे. अपनी बिरादरी के उत्थान हेतु कसक रखते थे. चाहते थे नौजवान बच्चे बच्चियां पढ़ लिखकर ऊँचा मक़ाम हासिल करें. उनके लिए कुछ लिखते तो छपने से पहले वह सुनाते. कोई मेरी अच्छी बात उन्हें अच्छी लगती, उसमे जोड़ देते या कोई यदि मुनासिब नही होती तो उसको हटा देते. अक्सर जब कोई अपने इलाके की किसी शख्सियत पर किताब लिखते या वहां के शाइयरों का शेरी मजमुआ होता तो मुझे फ़ोन करते, ” उबैद भाई फला हमारे इलाके के शायर हुए हैँ, अपनी जिंदगी मे नही छपवा पाए हैँ, सोचता हूँ कि छपवा दूँ. मगर एक इसके साथ गुज़ारिश हैँ कि इस पर आप को एक मज़मून लिखना होगा? बात आई गई. पंद्रह दिन के बात यादहानी के लिए फिर फ़ोन किया कि किताब ज़ियादा तर टाइप हो चुकी हैँ, बस आपके मज़मून की देर हैं. ” किसी के उपर लिखने के लिए मूड जब बन जाता हैँ तो आधे घंटे मे मज़मून कलमबंद हो जाता हैँ वरना महीनों लग जाते हैँ. लिखूं तो क्या लिखू, मन ही नही कलम उठाने को चाहता? मसला मेरे साथ अक्सर यह रहता हैँ कि कोई किताब के लिखने के बारे मे सोचता हूँ तो पहले खाका बनाता हूँ. फिर किताबें, दस्तावेजात की तलाश मे यहाँ के गांव गांव, चट्टी चट्टी जाकर तथ्य ढूंढता हूँ. सूबे के अलावा देश विदेश की नामचीन लाइब्रेरियों मे जाकर महीनों बैठकर गाज़ीपुर को ढूंढना पड़ता हैँ. वह तथ्य अंग्रेजी मे, फ़ारसी मे, उर्दू मे होते हैँ. यदि वे तथ्य हस्तलिखित हैँ तो जान लेवा पढ़ने के लिए बन जाते हैँ. कोई छपी किताब हैँ तो मेरे लिए आसानी नोट करने मे हो जाती हैँ. तब कही फिर कच्ची किताब तैयार हो पाती हैँ. टाइप, प्रूफ रीडिंग के बाद पैसे का जुगाड़ तब किताब मंज़रे आम पर आ पाती हैँ. इन्ही सब दुशवारियों से सरवत महमूद साहब भी गुज़रते हैँ. वह बताते थे कि उसिया के एक मेरे चाहने वाले क़ासिम साहब मेरे बड़े मददगार हैँ. वहीँ सबकुछ तैयार किताब करते हैँ. फिर किताब छप जाती हैँ. उनके जैसे कुछ और मुझे चाहने वाले हैँ. उनलोगी के लिए दिल से दुआ निकलती हैँ. इस तरह की वह बातें अक्सर किया करते. आप के घर याद हैँ, तीन – चार बार आया गया हूँ. पहली बार मुझे उनकी संस्था द्वारा बारा साहित्य सम्मान से नवाज़ा जाना था. दूसरी मुलाक़ात उनसे स्वतंत्रता आंदोलन मे गॉव बारा के योगदान पर हुई थीं. तीसरी मुलाक़ात कमसार – बार के मशहूर अफसाना निगार और साहित्यकार कैप्टेन ज़ैनुल आब्दीन साहब की ” मुसलमानो का उरुज और ज़वाल ” किताब के विमोचन समारोह मे मेरा वहां जाना हुआ था. यह तीनो आयोजन आपके  दौलत कदह के विशाल अहाते मे था. सबसे बड़ी बात मुझे लाने ले जाने मे लिए सरवत साहब ने अपनी कार का इंतिज़ाम कर दिया था तथा अपने छोटे भाई नस्सन साहब के बेटों को लाने लेजाने मे लगा दिया था. यह उनकी मुहब्बत ही थीं. हर मुलाक़ात मे मुझे सरवत भाई बेहद सहल और सहज़ इंसान लगे. बेहद खलीक़ थे. मिलते तो दिल खोलकर मिलते. यकीन जाने जब यह लिख रहा हूँ तो आँखों मे आंसू और कलम मे कपकपाहट सी हैँ. चुंकि मेरी ज़िन्दगी का पैशन और मकसद गाज़ीपुर से सम्बंधित तारीख को तीस वर्ष से उजागर करना हैँ. जिस दौर की तारीख़ मुझे लिखनी होती हैँ, सब से पहले उन जगहों को जाकर देखता हूँ, छानबीन करता हूँ, टीलो – खंडहरों पर चढ़ता हूँ, नदियों के किनारे किनारे मीलों बसी बस्तियों मे उधेड़ बिन करता हुआ आगे बढ़ता हूँ. यदि किसी नदी तट पर कोई युद्ध हुआ हो,वहां के मैदानो को जाकर देखता हूँ. बचपन मे कुछ मुग़लकालीन किताबों को पढ़ रखा था कि बारा गॉव के उस पार गंगा और कर्मनासा के संगम स्थित तट जो चौसा मैदान हैँ, वहां शेरशाह सूरी और बादशाह हुमायूं के मध्य भयंकर युद्ध हुआ था, खून की नदियाँ बही थीं जिसमे हुमायूं बुरी तरह पराजित होकर जान बचाने के लिए गंगा नदी मे मय घोड़े कूद गया था. तैरते हुए उस पार मुहम्मदबाद के वीरपुर इलाके मे निकला था. मन मे यह जिज्ञासा सालों से दबी थीं कि चौसा मैदान को देखा जाए. इसी बीच एक दिन सरवत साहब का फ़ोन आया कि जब कल आयंगे तो प्रोग्राम के बाद आपको नाव द्वारा गंगा और कर्मनासा संगम को दिखाने के साथ, यहाँ जो ध्वस्त रजा चेरु का कोट हैँ तथा चौसा मैदान हैँ वह दिखाने को ले चलेंगे. यकीन जानिए जैसे सूखे पेड़ मे हरियाली आजाए, वैसे ही हालत मुझे मे हुई. ख़ुशी का ठिकाना नही था. किसी तरह वह रात कटी. सेमिनार के लिए उनके घर बारा आया. प्रोग्राम के बाद प्रधान नस्सन साहब, गांव के कई लोग और खुद सरवत साहब मुझे उन जगहों को दिखाने के लिए ले गए जहाँ जंगे आज़ादी मे ब्रिटिश सेना ने जिन घरों मे घुसकर गोली मारी थीं, वहां के कुछ मकानों मे पकड़ने के लिए दबिश डाली थीं. कुछ के घर ढह दिया था, कुछ के यहाँ कुर्की की थीं और तो और वहां के किले को तोप के गोलों से बौछार किया था. उनमे एक ऐसा घर मैंने देखा जिसे उनके पूर्वजों ने सबूत के तौर पर वैसे ही नारिया पटरी वाला घर छोड़ रखा था. उनलोगो के साथ यादगार के रूप मे वहां एक ग्रुप फोटो सेशन भी हुआ. बड़ी मुहब्बत से चाय नाश्ता भी कराया. वहां से थोड़ा चलकर गांव की एक कदीमी मस्जिद जो वहां की जामा मस्जिद थीं, उसे देखने के बाद पास मे एक ऐसे घर मे गया जहाँ घोड़े भी बंधे थे. मालूम हुआ कि यहाँ कई ऐसे घर हैँ जहाँ आज भी घोड़े पालने, उनपर चढ़कर घूमने का शौक़ बारावासियों मे बरकरार हैँ. वह तारीखी बैठका था. वहां भी एक फोटो सरवत साहब और उनके छोटे बेटे तलत के साथ ली. जो इस मजमून के साथ संलग्न कर रहा हूँ. गांव की जिन-जिन गलियों से सरवत साहब के साथ हंमारा काफिला गुज़रता, उन गलियों के लोग हमलोगो का खैर मक़दम करते. उनकी कोशिश होती कि एक मिठाई ही हमारे द्वारे खाकर जाएं या एक प्याली चाय ही सही पी लें. यह मुहब्बत जिसके लिए यह गांव मशहूर था, अपनी आँखों से ऐसा देखा, पाया. यह सच हैँ – सच्ची मेज़बानी बारा मे मैंने पाई. सरवत महमूद साहब एक आला अदब नवाज़ थे. शेर – शायरी से शौक़ था. अदबी शेरी अक्सर महफिले सजाते थे. उनकी हौसला अफ़ज़ाई किया करते. ज़िला के नामचीन शायरों को अपने घर बुलाते. उनकी ज़ियाफत करते. ऐसा अक्सर वह करते. दीन से उन्हें बहुत लगाव था. अपनी मक्तबे फ़िक्र की कोई नई किताब खरीदते तो मुझे बताते. उसमे उन्हें जो बातें अच्छी लगती, उन पेजों को वह स्कैन कर के भेजते. उनके कमरे मे बेहतरीन किताबों का एक ज़खीरा था. उन्हें उन्होंने बड़े सलीके से सजा रखा था. जिस बिस्तर पर वह आराम करते और सोते थे, उसके इर्द – गिर्द कई किताबें पड़ी देखा. उनमे कुछ किताबों कि फ़ोटोस्ट भी थीं. बताया कि पुरानी किताबें अब मार्केट मे उपलब्ध नही हैँ, उनकी फोटोकॉपी करा लेता हूँ. जब उनके घर पहुँचता था तो उनके बेटे मेरे पास आ जाते थे. उनकी मुहब्बत और खालूस देख कर दिल बाग़ बाग़ हो उठता था. अक्सर उनकी बातो से लगा कि उन्हें अपने छोटे बेटे से बड़ा लगाव था और उसके मुस्तकबिल की फ़िक्र रहती थीं. अपनी बीवी की बीमारी का भी ज़िक्र अक्सर करते थे.अकसर बड़े खुश रहते तो कहते कि मेरी बीवी फरिश्ता सी हैँ. मेरे अच्छे – बुरे दिनों मे हमेशा साथ खड़ी रही. दुख – दर्द मे उसने बड़ा साथ दिया. सोचता हूँ कि अपनी जिंदगी मे ही अपने छोटे वाले बेटे तलत महमूद के लिए एक अच्छी बहू ले आऊं? एक दो जगह देखा हैँ. ऐसा शायद कुदरत को मंज़ूर नही था. बहू उतरने से पहले वह हक़ीकी कायनात के मालिक से जा मिले. अल्लाह उन्हें जन्नतुल फ़िरदौस मे जगह दें. आमीन 2023 मे, जब मैं हज बैतुल्लाह के सफर पर जाने वाला था तो उन्हें फ़ोन किया. सुनकर बेहद खुश हुए. वापसी पर, मुझसे मिलने को आने को कहा. एक दिन मालूम हुआ कि उनकी तबियत हर्ट की बीमारी की वजह से ख़राब हो गई हैँ. बनारस ले जाएं गए हैँ. फ़ोन किया तो मालूम हुआ कि तबियत अच्छी नही हैँ. फिर कुछ महीने बाद 19 जनवरी 2024 को खबर मिली कि इस दुनियां मे वह नही रहे. यह खबर सुनकर दिल बेचैन सा हो उठा. सरवत भाई के छोटे बेटे ने अपने वालिद के इंतिकाल होने की खबर दी थीं. देखा जाएं सरवत महमूद साहब एक असूल पसंद इंसान थे. वह जिनसे मिलते थे, दिल खोल कर मिलते थे. एक बात तो उनमे थीं कि वह कीना परवर इंसान नही थे. एक सच्चे मर्दे – मुजाहिद थे. एक अच्छे अदीब थे, एक अच्छे मोमिन थे. क्या गज़ब के इंसान थे. ऐसे अदब बवाज़ शख्श से कमसार व बार की बस्ती महरूम हो गई।

 

 

 

 

 

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