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भगवान शिव को पति रूप में पाने के लिए माता पार्वती ने की थी कठोर तपस्या, सुहागिन महिलाएं रखती हैं निर्जला व्रत

मुहम्मद खालिद

गाजीपुर। सुहागिन महिलाओं के प्रमुख धार्मिक पर्वों में शामिल हरितालिका तीज का महापर्व 14 सितंबर को श्रद्धा और भक्ति के साथ मनाया जाएगा। इस दिन महिलाएं अपने पति की दीर्घायु, सुख-समृद्धि तथा परिवार की मंगलकामना के लिए निर्जला व्रत रखती हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार हरितालिका तीज का संबंध भगवान शिव और माता पार्वती के पवित्र दांपत्य जीवन से है। पौराणिक कथा के अनुसार माता पार्वती ने भगवान शिव को पति रूप में प्राप्त करने के लिए कठोर तपस्या की थी। बताया जाता है कि माता पार्वती के पिता हिमालय उनकी इच्छा के अनुरूप उनका विवाह भगवान विष्णु से करना चाहते थे। माता पार्वती भगवान शिव को ही अपना पति मान चुकी थीं। उनकी सखी उन्हें ऐसी स्थिति से बचाकर वन में ले गईं, जहां माता पार्वती ने भगवान शिव की प्राप्ति के लिए कठिन तप किया। इसी प्रसंग के कारण इस व्रत को हरितालिका कहा जाता है। मान्यता है कि माता पार्वती की कठोर तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें पत्नी रूप में स्वीकार किया। इसी आस्था के चलते विवाहित महिलाएं हरितालिका तीज का व्रत रखकर भगवान शिव और माता पार्वती की पूजा करती हैं तथा अपने पति के स्वास्थ्य, दीर्घायु और दांपत्य जीवन में सुख-शांति की कामना करती हैं। कई स्थानों पर कुंवारी कन्याएं भी मनचाहे जीवनसाथी की कामना से यह व्रत एवं पूजन करती हैं। हरितालिका तीज पर निर्जला व्रत रखने की परंपरा है। व्रती महिलाएं सूर्योदय से लेकर पूजा और व्रत पारण तक अन्न-जल ग्रहण नहीं करती हैं। दिनभर महिलाएं शिव-पार्वती के ध्यान और धार्मिक गतिविधियों में समय बिताती हैं। शाम को स्नान एवं श्रृंगार के बाद भगवान शिव, माता पार्वती और गणेश जी की पूजा की जाती है तथा हरितालिका तीज की कथा सुनी जाती है। इस पर्व में सोलह श्रृंगार का भी विशेष महत्व माना जाता है। महिलाएं मेहंदी लगाती हैं, चूड़ी, बिंदी, सिंदूर, मंगलसूत्र एवं अन्य श्रृंगार सामग्री धारण कर माता पार्वती की पूजा करती हैं। कई स्थानों पर महिलाएं सामूहिक रूप से पूजा-अर्चना और तीज की कथा का आयोजन करती हैं। धार्मिक मान्यता के साथ हरितालिका तीज पति-पत्नी के बीच प्रेम, विश्वास और समर्पण का संदेश भी देता है। यह पर्व महिलाओं की श्रद्धा, तपस्या और पारिवारिक सुख-शांति की भावना से जुड़ा हुआ है। इसी कारण हर वर्ष बड़ी संख्या में महिलाएं पूरे विधि-विधान और श्रद्धा के साथ इस महापर्व को मनाती हैं।

 

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