गाजीपुर। आचार्य नरेंद्र देव कृषि एवं प्रौद्योगिक विश्वविद्यालय कुमारगंज,अयोध्या के अंतर्गत संचालित कृषि विज्ञान केंद्र आंकुशपुर गाजीपुर के द्वारा ग्राम- मुबारकपुर, ब्लॉक- करण्डा में किसानों को जागरूक करने हेतु उर्वरकों का संतुलित प्रयोग विषय पर एक विशेष जागरूकता अभियान का आयोजन किया गया। कार्यक्रम में केंद्र के वरिष्ठ वैज्ञानिक एवं अध्यक्ष (डॉ. राम गोपाल यादव )कृषि वैज्ञानिक डॉ. ए. के सिंह , डॉ. शशांक सिंह, डॉ. दीपक प्रजापति ने किसानों को ढैंचा हरी खाद के रूप में प्रयोग एवं मृदा स्वास्थ पर सकारात्मक प्रभाव पर विस्तार से बताया। आधुनिक कृषि यंत्र और वैज्ञानिक तकनीक का मेल आज जैविक खेती के लिए सबसे मजबूत आधार बन चुका है। इन तीनों के समन्वय से न केवल मिट्टी की उर्वरता बढ़ती है, बल्कि किसानों की आय में भी भारी वृद्धि हो रही है। जैविक खेती की शुरुआत पशुओं के बिना अधूरी है। गाय और भैंस का गोबर और गोमूत्र, जीवामृत, घनजीवामृत और प्राकृतिक खाद बनाने के प्राथमिक स्रोत हैं। पशु केवल दूध ही नहीं देते, बल्कि खेत को नाइट्रोजन, फास्फोरस और पोटाश जैसे पोषक तत्व प्राकृतिक रूप से प्रदान करते हैं। वैज्ञानिकों द्वारा विकसित आधुनिक यंत्र अब जैविक खेती को आसान बना रहे हैं।हैप्पी सीडर और मल्चर जैसे यंत्र फसल अवशेषों को जलाने के बजाय मिट्टी में मिलाने में मदद करते हैं, जिससे मिट्टी में कार्बन की मात्रा बढ़ती है। जैविक तरल खादों (जैसे पंचगव्य) के छिड़काव के लिए अब ड्रोन का उपयोग किया जा रहा है, जिससे समय और लागत दोनों की बचत होती है। कृषि वैज्ञानिकों की भूमिका इसमें मार्गदर्शक की है। वैज्ञानिक अब मृदा स्वास्थ्य कार्ड के माध्यम से बताते हैं कि मिट्टी को किस तत्व की आवश्यकता है। वे पारंपरिक ज्ञान को आधुनिक शोध से जोड़कर ऐसी तकनीकें दे रहे हैं जिनसे कीट नियंत्रण के लिए रसायनों की जगह नीम का तेल, दशपर्णी अर्क और फेरोमोन ट्रैप का प्रभावी उपयोग किया जा सके।
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