गाजीपुर। आचार्य नरेंद्र देव कृषि एवं प्रौद्योगिक विश्वविद्यालय कुमारगंज, अयोध्या के अंतर्गत संचालित कृषि विज्ञान केंद्र अंIकुशपुर, गाजीपुर-II के वैज्ञानिकों द्वारा ग्राम- सहेड़ी, ब्लॉक- करण्डा के किसानों के लिए ‘उर्वरकों का संतुलित प्रयोग विषय पर एक विशेष जागरूकता कार्यक्रम आयोजित किया गया। डॉ0 ए0 के0 सिंह ( पशुपालन वैज्ञानिक ) ने किसानों को अवगत कराया कि आज के दौर में कृषि और पशुपालन को अलग-अलग करके देखना न केवल आर्थिक नुकसान का सौदा है बल्कि यह मिट्टी की सेहत के लिए भी चिंताजनक है। खेती की बढ़ती लागत और रसायनों के अंधाधुंध प्रयोग ने मृदा स्वास्थ्य को गंभीर संकट में डाल दिया है, जिसका सीधा असर पशुओं के स्वास्थ्य और दूध की गुणवत्ता पर पड़ रहा है। फसल उर्वरक प्रबंधन की आधुनिक अवधारणा हमें बताती है कि एक स्वस्थ खेत ही पौष्टिक चारे का आधार है। जब किसान केवल यूरिया या डीएपी पर निर्भर रहते हैं तो मिट्टी में आवश्यक सूक्ष्म पोषक तत्वों का संतुलन बिगड़ जाता है, जिससे चारे में खनिज तत्वों की कमी हो जाती है और पशुओं की प्रजनन क्षमता व दूध देने की शक्ति घटने लगती है।इस चक्र को सुधारने के लिए पशुपालन से प्राप्त गोबर और मूत्र को मिट्टी की निरंतर प्रयोग करते रहे। डॉ0 दीपक प्रजापति (मृदा वैज्ञानिक), ने किसानों को बताया कि गोबर की खाद और वर्मीकम्पोस्ट का प्रयोग मिट्टी की संरचना में सुधार करता है, जिससे मिट्टी की जल धारण क्षमता बढ़ती है और पौधों को पोषक तत्वों का अवशोषण करने में आसानी होती है। डॉ0 पंकज कुमार (वैज्ञानिक कृषि अभियांत्रिकी ) ने किसानों को बताया कि खेती में अभियांत्रिकी तकनीकों का समावेश भी मिट्टी को जीवित रखने में सहायक है।लेजर लैंड लेवलर के उपयोग से पानी का समान वितरण सुनिश्चित होता है, जिससे मिट्टी के कटाव और पोषक तत्वों के बहने की समस्या कम होती है। हैप्पी सीडर और मल्चर जैसी मशीनें फसल अवशेषों को जलाने के बजाय उन्हें वापस मिट्टी में मिलाकर उसे जैविक कार्बन से समृद्ध करती हैं।
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