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देवी अदिति ने की थी सबसे पहली छठ पूजा

गाजीपुर। जब बात छठ पूजा के आरम्भ की आती है तो इस बारे में अलग अलग मत हैं। सबसे पहले छठ पूजा करने का वर्णन दो कथाओं में मिलता है। एक तो ब्रह्मपुत्र मनु के पुत्र प्रियव्रत द्वारा,  इसके अतिरिक्त छठ पूजा के व्रत को रखने का जो सबसे प्राचीन इतिहास मिलता है वो है दक्षपुत्री एवं देवमाता अदिति के द्वारा। इन दोनों को सबसे प्राचीन छठ व्रत के रूप में मान्यता प्राप्त है। ब्रह्मा के पुत्र हुए प्रजापति दक्ष। इनकी तेरह कन्याओं का विवाह महर्षि मरीचि के पुत्र महर्षि कश्यप से हुआ। कहते हैं दक्ष कन्याओं और महर्षि कश्यप से ही सभी योनि के प्राणियों का जन्म हुआ। उन तेरह कन्याओं में सबसे ज्येष्ठ थी अदिति जिनसे सभी देवों का जन्म हुआ जिन्हे आदित्य कहा गया। दक्ष की दूसरी पुत्री दिति से सभी दैत्यों का जन्म हुआ। इस प्रकार दैत्य देवताओं के छोटे भाई हुए। समय के साथ साथ दैत्यों और देवों में वैमनस्य बढ़ता गया जिसने अंततः देवासुर संग्राम का रूप ले लिया। दैत्य स्वाभाविक रूप से दैत्यों से अधिक शक्तिशाली थे और साथ ही साथ मायावी भी। त्रिदेवों के तटस्थ रहने के कारण उनकी सहायता देवताओं को नहीं मिल पायी और पहले देवासुर संग्राम में देवताओं की पराजय हुई। दैत्यों ने स्वर्ग सहित तीनों लोकों पर अपना अधिकार जमा लिया। तब देवों की माता अदिति परमपिता ब्रह्मा के पास गयी और उनसे अपनी स्थिति बताई। तब ब्रह्मदेव ने स्वयं से उत्पन्न देवसेना, जो षष्ठी देवी के नाम जानी जाती थी, उनकी पूजा करने को कहा। तब माता अदिति ने सौ वर्षों तक षष्ठी देवी की आराधना की। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर षष्ठी देवी ने उन्हें दर्शन दिए और चार दिनों का अत्यंत कठिन व्रत रखने को कहा। उस व्रत की सम्पति के बाद माता ने प्रसन्न होकर उन्हें वरदान मांगने को कहा। तब अदिति ने उनसे अपनी स्थिति बताई जिसे सुनकर षष्ठी देवी ने उन्हें एक सर्वगुण संपन्न पुत्र का आशीर्वाद दिया। उनके वरदान के फलस्वरूप माता अदिति को त्रिदेवों के गुणों से युक्त पुत्र की प्राप्ति हुई जिनका नाम आदित्य हुआ। यही आदित्य बाद में जाकर विवस्वान या सूर्य के रूप में प्रसिद्ध हुए। तब देवताओं ने आदित्य के तेज को साथ लेकर दैत्यों पर आक्रमण किया और अंततः विजय प्राप्त की। माता अदिति द्वारा रखे गए इस चार दिन के व्रत को ही प्रथम छठ पूजा माना जाता है। माता षष्ठी ही बाद में अपभ्रंश होकर छठ माई कहलाने लगी। जहाँ माता अदिति ने ये व्रत रखा था वो विश्व में देव सूर्य मंदिर के नाम से प्रसिद्ध हुआ जो बिहार के औरंगाबाद जिले के देव नमक गांव में है। ये मंदिर भी अपने आप में चमत्कारी मंदिर है और इसके चमत्कार के समक्ष तो स्वयं औरंगजेब जैसा पापी भी नतमस्तक हो गया था। माता अदिति द्वारा किये जाने और आदित्य के जन्म के कारण ही छठ पूजा में भगवान सूर्यनारायण का इतना महत्त्व है। यही कारण है कि छठ में हम अस्त होते हुए और उदित होते हुए सूर्यनारायण को अर्घ्य देते हैं और हमें जीवन देने के लिए उनका धन्यवाद करते हैं। इस पर्व का महत्त्व इतना अधिक है कि इसे महापर्व की संज्ञा दी गयी है। अब आते हैं पुरुष द्वारा की गयी सबसे पहली छठ पूजा पर। ये तो हम सभी को पता है कि छठ पूजा कोई लिंग विशेष पूजा नहीं है और इसे स्त्री या पुरुष दोनों कर सकते हैं। पुराणों में भी देवी अदिति और प्रियव्रत द्वारा सर्वप्रथम इस पूजा को करने का प्रसंग आया है। परमपिता ब्रह्मा के पुत्र हुए मनु, जिन्हे हम स्वम्भू मनु के नाम से भी जानते हैं। ब्रह्मदेव के ही वाम अंग से जन्मी शतरूपा के साथ मनु ने विवाह किया जिससे समस्त मानवों का जन्म हुआ। मनु के नाम से ही हम मानव कहलाते हैं। दोनों के दो पुत्र हुए – प्रियव्रत और उत्तानपाद। उत्तानपाद के पुत्र ही महान भक्त ध्रुव हुए जिन्होंने भगवान विष्णु की कृपा से अनंत लोक को प्राप्त किया। मनु के दूसरे पुत्र प्रियव्रत की कोई संतान नहीं थी। उनकी पत्नी का नाम मालिनी था। संतानहीन होने के कारण प्रियव्रत और मालिनी बड़े दुखी रहते थे। एक समय महर्षि कश्यप प्रियव्रत के राज्य में पधारे। वे महर्षि मरीचि के पुत्र और प्रियव्रत और उत्तानपाद के बड़े भाई थे। राजा प्रियव्रत और मालिनी ने उनका बड़ा आदर सत्कार किया और मन से उनकी सेवा की। महर्षि कश्यप उनकी सेवा से बड़े प्रसन्न हुए किन्तु उन दोनों को दुखी देख कर महर्षि कश्यप ने इसका कारण पूछा। इसपर प्रियव्रत ने उन्हें अपने संतानहीनता के बारे में बताया। उनका दुःख देखकर महर्षि कश्यप ने प्रियव्रत के लिए पुत्रेष्टि यज्ञ करवाने का निश्चय किया। शुभ मुहूर्त में उन्होंने यज्ञ आरम्भ किया और यज्ञ के समाप्ति तक यज्ञ के फलस्वरूप देवी मालिनी गर्भवती हो गयी। उसके बाद महर्षि कश्यप उन दोनों को आशीर्वाद देकर अपने आश्रम लौट गए। राजा प्रियव्रत और मालिनी अपने होने वाले पुत्र के बारे में सोच कर बड़े प्रसन्न रहते थे। किन्तु उनकी ये प्रसन्नता अधिक देर तक ना रही। नौवें मास में जब मालिनी को प्रसव हुआ तो उनका पुत्र मृत पैदा हुआ। ये देख कर प्रियव्रत के दुःख का ठिकाना ना रहा और वे पुत्र वियोग में उसका शव लेकर वन-वन भटकने लगे। एक दिन उन्होंने अपने प्राणों का अंत करने का निश्चय किया और स्वयं को भस्म करने के लिए अग्निकुंड की ओर दौड़े। इससे पहले कि वे आत्मदाह कर पाते, अचानक स्वर्ग से एक दिव्य विमान उनके सामने उतरा और उससे एक देवी प्रकट हुई। उनका रूप और तेज देख कर प्रियव्रत ने उनसे उनका परिचय पूछा। तब उस देवी ने कहा – “हे राजन! मैं परमपिता ब्रह्मा की मानस पुत्री देवसेना हूँ। मेरा प्रादुर्भाव ब्रह्मदेव के छठे अंश से हुआ है इसीलिए मेरा एक नाम षष्ठी भी है। किन्तु आप क्यों अपने जीवन का अंत करना चाहते हैं। तब प्रियव्रत ने उन्हें बताया कि किस प्रकार उनका पुत्र मृत पैदा हुआ। ये सुनकर उस देवी ने उनके पुत्र को स्पर्श किया और उनके स्पर्श से वो शिशु तत्काल जीवित हो क्रंदन करने लगा। जब प्रियव्रत ने ये चमत्कार देखा तो उन्होंने भिन्न-भिन्न प्रकार से उस देवी की पूजा की। जिस दिन देवसेना ने प्रियव्रत के पुत्र को जीवित किया था वो कार्तिक मास की षष्टी तिथि थी। तब प्रियव्रत ने उनसे कहा कि वे उनकी और क्या सेवा कर सकते हैं? तब षष्ठी माता ने कहा कि वे चाहती हैं कि पृथ्वी पर उनकी पूजा सदा होती रहे। प्रियव्रत तो प्रजापति थे ही अतः उन्होंने माता षष्ठी की पूजा का विधान बना दिया। सर्वप्रथम उन्होंने स्वयं कठिन व्रत रखकर उनकी पूजा की और तब से लेकर आज तक वो क्रम चलता आ रहा है। उन्ही देवसेना या षष्टी देवी को आज हम छठ मैया के नाम से जानते हैं। दक्षिण भारतीय धार्मिक ग्रंथों के अनुसार बाद में इन्ही देवसेना का विवाह महादेव के ज्येष्ठ पुत्र कार्तिकेय से हुआ।

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