गाजीपुर। श्री रामलीला समिति देवकली द्वारा श्रीराममंच पर नारद मोह की रामलीला प्रस्तुत किया गया। एक बार नारद को अपनी तप और बुद्धि का अहंकार (घमंड) हो गया था । हिमालय पर्वत में एक बड़ी पवित्र गुफा थी। वहीं बैठ कर तपस्या में लीन हो गए । नारद मुनि की इस तपस्या से देवराज इंद्र ने सोचा नारद हमारा सिंहासन छीन लेगा।कामदेव को भेजा परन्तु तपस्या भंग नही कर सका।भगवान विष्णु ने माया से एक नगर का निर्माण किया।शिलनिधि राजा के पास विश्व मोहिनि कन्या थी।नारद ने हस्त रेखा देखा तो मोहित हो गये विचार किया इस कन्या से जो विवाह करेगा अमर हो जायेगा तथा उसे कोई जीत नही सकता।नारद मुनि ने वॆराग्य भूल कर श्री हरि को याद किया और भगवान विष्णु उनके सामने प्रकट हो गए। नारद जी ने उन्हें सारी बात बताई और कहने लगे, हे नाथ आप मुझे अपना सुंदर रूप दे दो, ताकि मैं उस कन्या से विवाह कर सकूं। भगवान हरि ने कहा हे नारद! हम वही करेंगे जिसमें तुम्हारी भलाई हो। विष्णु जी ने अपनी माया से नारद जी को बंदर का रूप दे दिया । नारद जी को यह बात समझ में नहीं आई। वो समझे कि मैं बहुत सुंदर लग रहा हूं। वहां पर छिपे हुए शिव जी के दो गणों ने भी इस घटना को देख लिया।ऋषिराज नारद तत्काल विश्व मोहिनी के स्वयंवर में पहुंच गए और साथ ही शिव जी के वे दोनों गण भी ब्राह्मण का रूप बना कर वहां पहुंच गए। वे दोनों गण नारद जी को सुना कर कहने लगे कि भगवान ने इन्हें इतना सुंदर रूप दिया है कि राजकुमारी सिर्फ इन पर ही रीझेगी। उनकी बातों से नारद जी मन ही मन बहुत खुश हुए। स्वयं भगवान विष्णु भी उस स्वयंवर में एक राजा का रूप धारण कर आ गए। विश्व मोहिनी ने कुरूप नारद की तरफ देखा भी नहीं और राजा रूपी विष्णु के गले में वरमाला डाल दी।नारद का घमंड चूर हो गया।
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