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अगस्‍त क्रांति: मुस्‍ताक अहमद व उनके भाई जुनैद अहमद ने नंदगंज को अंग्रेजों से 5 घंटे तक कराया था आजाद

गाजीपुर। अगस्त क्रांति के महानायको की गाथा अंग्रेजी जिलाधिकारी द्वारा नंदगंज थाने और रेलवे स्टेशन पर क्रांतिकारियों के जघन्य हत्याकांड की जिसने हिला कर रख दिया था अंग्रेज सरकार को। 8 अगस्त 1942 को जब कांग्रेस पार्टी ने अपने मुंबई अधिवेशन में भारत छोड़ो प्रस्ताव पारित किया था तो अंग्रेजों ने उसे शक्ति और सख्ती से कुचलने का फैसला किया नतीजा यह हुआ कि महात्मा गांधी और जवाहरलाल नेहरू सहित कांग्रेस के नेता गिरफ्तार किए जाने लगे लेकिन अगले दिन यानी 9 अगस्त को क्रांतिकारी की एक टोली अरुणा आसिफ अली के नेतृत्व में गोवलिया टैंक मैदान में तिरंगा फहराया तो अंग्रेजों ने आंसू गैस के गोले छोड़े और यहीं से भारत छोड़ो आंदोलन का वास्तविक सूत्रपात हुआ और यह चिंगारी निकाल कर उत्तर प्रदेश के गाजीपुर जिले के नंदगंज तक पहुंच गई और नंदगंज को पूरे 5 घंटे तक अंग्रेजों से आजाद कराने वाले मुश्ताक अहमद और उनके भाई जुनैद आलम जिनकी हत्या अंग्रेजों की गोली से हुई थी उनके बारे में प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी द्वारा विमोचित पुस्तक डिक्शनरी ऑफ में मैरटायर्स वॉल्यूम त-२ पेज नंबर 347 में लिखा है कि नंदगंज थाने में कब्जा करने और रेलवे स्टेशन पर खड़ी अंग्रेजों की ट्रेन लुटवाने और सरकारी संपत्ति को जलाने के आरोप में मुस्ताक अहमद के भाई जुनैद आलम को अंग्रेज अफसर ने गोली मार दी जिससे उनकी वही मौत हो गई थी। आज कहानी नंदगंज की में नंदगंज स्वतंत्रता आंदोलन के नायक मुश्ताक अहमद अपनी जीवनी में लिखते हैं महात्मा गांधी के आह्वान पर गाजीपुर की आम वाम भी बहुत उत्साहित होकर अंग्रेजों को नुकसान पहुंचाने के लिए उतावली हो रही थी लोग 10 अगस्त के बाद जत्थे के जत्थे हमारे गांव कुर्बान सराय आने लगे और अंग्रेजों के खिलाफ आंदोलन  के लिए अपना सहयोग देने और सहयोग लेने की बात करने लगे बरहपुर गांव के बाबू भोला सिंह, नैसारा के रामधारी पहलवान, नारी पचदेवरा के शहीद विश्वनाथ मैनपुर के बड़े बबुआनो  विलासी के डोमा लोहार जैसे  आम अवाम और जमींदार लोगों के मिलने से यह महसूस होने लगा कि अब अंग्रेजों को भगाना मुश्किल नहीं है तय  यह हुआ कि सभी लोग जत्थे के साथ नंदगंज पहुंचे। तिथि तय हुई 18 अगस्त 1942 और डोमा लोहार को सबको खबर देकर के एक जगह इकट्ठा करने की जिम्मेदारी दी गई। अगले दिन ही रेलवे लाइन के आसपास खेतों में लोग इकट्ठा होने लगे। मुश्ताक अहमद,शहीद जुनेद आलम ,बाबू भोला सिंह, रामधारी पहलवान सबसे आगे चल रहे थे और 50 युवकों की टोली उनके पीछे-पीछे चल रही थी। मुस्ताक अहमद का इन्कलाबी जत्था उनके पीछे इंकलाब जिंदाबाद का नारा लगा रहा था और अंग्रेजों भारत छोड़ो महात्मा गांधी जिंदाबाद का नारा लगाते हुए नंदगंज थाने के ठीक सामने भारी भीड़ जमा हो गई थाना देखकर के ही जनता आक्रोशित होने लगी नंदगंज थाने का दरोगा कुछ सिपाहियों के साथ कोतवाली के गेट को बंद करके बंदुक हाथ में लेकर घबराहट में जोर-जोर से चिल्ला रहा था वापस चले जाओ नहीं तो हमें गोली चलानी पड़ेगी 6 फुट लंबे हस्ट पुष्ट नौजवान जुनेद आलम, नामी पहलवान रामधारी यादव और बरहपुर के बाबू भोला सिंह ने थाने के बोसीदा कमजोर गेट को धकेल कर नंदगंज थाने में प्रवेश किया तो पुलिस कर्मियों ने खुद को एक कमरे में बंद कर लिया सैकड़ो क्रांतिकारियों ने मुश्ताक अहमद के ललकार पर नंदगंज थाने पर कब्जा कर लिया और अंग्रेजों का झंडा उतार कर तिरंगा लहरा दिया तिरंगा लहराने के बाद मुस्ताक अहमद और जुनैद आलम के नेतृत्व में क्रांतिकारी साथियों के साथ लोग नंदगंज रेलवे स्टेशन की ओर बढ़े। रेलवे स्टेशन को आग लगाने के बाद रेलवे पटरी को उखाड़ दिया गया वहां से गुजर रही मालगाड़ी में अंग्रेजी सेना का हथियार और रसद लगा हुआ था जो पटरी उखाड़ने के कारण रुक गई और क्रांतिकारी डोमां लोहार ने चीनी हथौड़ी से मालगाड़ी के सभी ताले काट दिए और लोगों ने ट्रेन में रखे अनाज और रसद को गांव में बंटवा दिया इन सभी पूरी घटना में पूरे 5 घंटे थाने और  रेलवे स्टेशन पर तिरंगा शान से लहराता रहा 5 घंटे बाद लगभग 2:00 बजे अंग्रेज जिला अधिकारी और कप्तान मुनरो तूफान थमने पर नंदगंज पहुंचे तब तक जुनेद आलम ,रामधारी पहलवान, मुस्ताक अहमद, अपने साथियों के साथ नंदगंज में डटे हुए थे अंग्रेजो ने इनको देखते ही गोलियों की बौछार शुरू कर दी जिसमें जुनेद आलम वही शहीद हो गए और मुस्ताक अहमद और रामधारी पहलवान सहित कई लोग घायल हुए और किसी तरह से वहां से निकलने में कामयाब रहे। भारत सरकार के विभिन्न पुस्तको में जुनैद आलम का जिक्र होता रहा है।उसके बाद नन्दगज के क्रांतिकारी योद्धाओं पर अंग्रेजों ने ज़ुल्म की हद पार कर दी।

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