गाजीपुर। सनातन हिंदू धर्म में पिंडदान अपने मृत पूर्वजों की आत्मा की शांति, तृप्ति और उन्हें मोक्ष दिलाने के लिए किया एक अत्यंत पवित्र और अनिवार्य धार्मिक अनुष्ठान करते है। मान्यता है कि पिंडदान करने से पितर प्रसन्न होते हैं और परिवार को सुख, समृद्धि तथा दीर्घायु का आशीर्वाद देते हैं। जमानियां कस्बा बाजार स्थित पक्का बलुआ घाट गंगा नदी किनारे ग्रामीण क्षेत्रों के लोग पहुंचकर विधि पूर्वक ब्राह्मणों से पिंडदान के दौरान पके हुए चावल, काले तिल, घी, दूध और शहद को मिलाकर गोल आकार के गोले बनाकर अपने पूर्वजों को पिंडदान किया। उसी को पिंड कहा जाता है। यह पिंड मृत पूर्वजों की आत्मा को अन्न के रूप में किया जाता है। जिससे वे प्रेत योनि से मुक्त होकर उच्च लोकों या मोक्ष की ओर बढ़ते है। युवा ब्राह्मण पुजारी उद्धव पाण्डेय ने बताया कि भाद्रपद पूर्णिमा से लेकर अश्विन अमावस्या तक के 16 दिनों की अवधि को पितृ पक्ष या महालय कहा जाता है। इस दौरान पिंडदान करना सबसे उत्तम माना गया है। उन्होंने कहा कि प्रतिवर्ष आने वाली पूर्वज की मृत्यु की तिथि पर भी पिंडदान किया जाता है। पिंडदान घर पर या किसी पवित्र नदी के किनारे किया जा सकता है। लेकिन कुछ विशेष तीर्थों पर इसका फल अक्षय माना जाता है। पांडेय ने बताया कि गया विष्णुपद मंदिर और फल्गु नदी के किनारे स्थित गयाजी को पिंडदान के लिए सर्वश्रेष्ठ माना गया है। जहां स्वयं भगवान विष्णु ने गयासुर को वरदान दिया था। उद्धव पांडेय ने बताया कि पिंडदान हमेशा किसी योग्य पुरोहित या पंडित के मार्गदर्शन में ही संपन्न करना चाहिए। हमेशा दक्षिण दिशा की ओर मुख करके बैठें। श्वेत वस्त्र पहनें और जनेऊ को दाएं कंधे पर रखें। इसके साथ ही हाथ में जल, कुश और तिल लेकर अपने पूर्वज का नाम और गोत्र बोलकर पिंडदान का संकल्प लेना चाहिए। बाद में पिंडों को पवित्र नदी या जल में प्रवाहित कर दिया जाता है। इसके बाद ब्राह्मणों को भोजन कराया जाता है और कौवे, गाय तथा कुत्ते के लिए भोजन का अंश निकाला जाता है।

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