गाजीपुर। अति प्राचीन रामलीला कमेटी हरि शंकरी की ओर से लीला के बारहवें दिन 28 सितंबर दिन रविवार की शाम 7:00 बजे स्थानीय रामलीला मैदान लंका में शूर्पणखा नक्कटैया, खर दूषण वध, तथा सीता हरण लीला का मंचन किया गया। इसके पूर्व कमेटी के मंत्री ओमप्रकाश तिवारी, उप मंत्री लवकुमार त्रिवेदी, प्रबंधक मनोज कुमार तिवारी, उपप्रबंधक मयंक तिवारी प्रबंधक तथा कोषाध्यक्ष रोहित अग्रवाल ने पूजा आरती किया। लीला के दौरान बंदे बाणी विनायकौ आदर्श रामलीला मंडल के कलाकारों द्वारा सर्वप्रथम शूर्पणखा नक्कटैया लीला का मंचन किया गया। एक बार सूर्पनखा नामक रावण की बहन थी जो नागिन के समान भयानक और दुष्ट हृदय की थी वह पंचवटी मैं गई और दोनों राजकुमारों को देखकर विकल हो गई। सूर्पनखा जैसी राक्षसी धर्म ज्ञान शून्य कामांध स्त्री मनोहर पुरुष को देखकर चाहे वह भाई पिता पुत्र ही हो विकल हो जाती है और मन को नहीं रोक सकती। जैसे सूर्यकांत मनी सूर्य को देखकर द्रवित हो जाती है वह सुंदर रूप धरकर प्रभु के पास जाकर और बहुत मुस्कुरा करके वचन बोली की तुम सम पुरुष न मो सम नारी। यह संजोग विधि रचा बिचारी।वह कहती है कि न तुम्हारे समान न कोई पुरुष है ना मेरे समान स्त्री विधाता ने यह संजोग बहुत विचार कर रचा है। मेरे योग्य पुरुष जगत भर में नहीं है मैंने तीनों लोको में खोज देखा। इसी से मैं अब तक अविवाहित रही ।अब तुमको देखकर कुछ मन माना है सीता जी की ओर देखकर प्रभु श्री राम ने यह बात कही कि मेरा छोटा भाई कुमार है तब वह लक्ष्मण जी के पास गई लक्ष्मण जी उसे शत्रु की बहन समझ कर और प्रभु की ओर देखकर कोमल बाणी से बोलते हैं की सुंदरी-सुनु मैं उन्ह कर दासा। पराधीन नहीं तोर सुपासा। हे सुंदरी सुन मैं तो उनका दास हूं मैं पराधीन हूं अतः तुम्हें सुख न होगा प्रभु समर्थ है कोशलपुर के राजा हैं वह जो कुछ करें उन्हें सब करना है। सेवक सुख चाहे भिखारी सम्मान चाहे व्यसनी धन और व्यभिचार शुभ गति चाहे लभी यश चाहे और अभिमानी चारों फल अर्थ धर्म काम मोक्ष चाहे तो यह सब प्राणी आकाश को दोह कर दूध लेना चाहते हैं अर्थात असंभव बात को संभव करना चाहते हैं इसके बाद वह लौटकर फिर राम जी के पास आई। प्रभु ने फिर उसे लक्ष्मण जी के पास भेज दिया लक्ष्मण जी ने कहा तुम्हें वही बरेगा जो लज्जा को तृण तोड़कर त्याग देगा अर्थात जो निपट निर्लज होगा। तब वह क्रोद्धित होकर श्री राम जी के पास गई और उसने अपना भयंकर रूप प्रकट किया जिसे देखकर सीता जी भयभीत हो गई। सीता जी को भयभीत देखकर श्री राम जी ने लक्ष्मण जी को इशारा कर दिया लक्ष्मण ने इशारा पातें ही बड़ी फूर्ती से उसको बिना नाक कान का कर दिया। मानो उसके हाथ रावण को चुनौती दी हो। वह बिना नाक कान के विकराल हो गई उसके शरीर से रक्त बहने लगा जैसे पर्वत को गेरू की धारा बह रही हो वह रोती बिलखती हुई खरदूषण के पास गई और बोली है भाई तुम्हारे पौरुष को धिक्कार है खर दूषण अपनी बहन को देखा तो उन्होंने पूछा तब सूर्पनखा ने सब समझा कर सारी बातै कह देती है। यहबात सुनकर राक्षसों की सेना तैयार की, रक्ष सो का समूह झुंड के झुंड दौड़े मानो पर्वतों का झुंड हो। और नाना वाहन नाना कारा। नाना युद्ध धर घोर अपारा। सूर्पनखा आगे करि लीनी। असुभ रुप श्रुति नासा हीनी। वे अनेकों प्रकार की सवारी पर चढ़े हुए तथा अनेको प्रकार आकर के हैं। वे अपार है और अनेको प्रकार के संख्या मेंभयानक हथियार धारण किए हुए हैं उन्होंने नाक कान कटी हुई अमंगल रूपिणी सूर्पनखा को आगे कर लिया। अगनित भयंकर अंशकुन हो रहे हैं। परंतु मृत्यु के वशमें होने के कारण वे सब के सब उनको कुछ गिनते हैं नहीं। गरजते हैं ललकारते हैं आकाश में उड़ते हैं इसे देखकर योद्धा लोग बहुत ही हर्षित होते हैं कोई कहता है दोनों भाइयों को जीतै ही पकड़ लो पकड़ कर मार डालो और इसके स्त्री को छीन लो। आकाश मंडल धूल से भर गया तब श्री राम ने लक्ष्मण को बुलाकर उनसे कहा राक्षसों की भयानक समूह आ गई है जानकी जी को लेकर तुम पर्वत की कंदरा में चले जाओ सावधान रहना प्रभु श्री राम जी के बचन सुनकर लक्ष्मण जी धनुष हाथ में लिए सीता जी सहित चले। शत्रुओं की सेना समीप चली आई है यह देखकर श्री राम जी ने हंसकर कठिन धनुष को चढ़ाया कठिन धनुष चढ़ाकर सिर पर जटा का जुड़ा बांधते हुए प्रभु कैसे शोभित हो रहे हैं जैसे मरकत मणि के पर्वत करोड़ों बिजलियों से दो सौप लड़ रहे हो। कमर में तरकश कस कर विशाल भुजा में धनुष लेकर और बाण सुधार कर प्रभु श्री राम राक्षसों की ओर देख रहे हैं मानो मत वाले हाथियों के समूह को देखकर सिंह देख रहा हो पकड़ो पकड़ो पुकारते हुए राक्षस योद्धा बाग की छोड़कर दौड़े हुए आए और उन्होंने श्री राम जी को चारों ओर से घेर लिया। बाल सूर्य को अकेला देखकर मंदह नामक दैत्य घेर लेते हैं। प्रभु श्री राम को देखकर राक्षस की सेना थकित रह गई वे उन पर बाण नहीं छोड़ सके। मंत्री को बुलाकर खर दूषण ने कहा यह राजकुमार कोई मनुष्य का भूषण है जितने भी नाग असुर देवता मनुष्य और मुनि है इनमें से हमने ना जाने कितने ही देख जीते और मार डाले हैं। हे भाइयों सुनो हमने जन्म भर मेंऐसी सुंदरता कहीं नहीं देखी यद्यपि उन्होंने हमारी बहन को कुरूप कर दिया तथापि यह अनुपम पुरुष वध करने योग्य नहीं है छिपाई हुई अपनी स्त्री हमें तुरंत दे दो और दोनों भाई जीते जी घर लौट जाओ। मेरा यह कथन तुम लोग उसे सुनाओ और उसका वचन सुनकर शीघ्र आओ दूतो ने जाकर यह संदेश श्री राम जी से कहा उसे सुनते ही श्री राम मुस्कुरा कर बोले हम क्षत्री हैं वन में शिकार करते हैं और तुम्हारे सरीखे के दुष्ट पशुओं को तो ढूंढते हैं हम बलवान शत्रु को देखकर नहीं डरते हैं एक बार तो हम काल से भी लड़ सकते हैं यद्यपि हम मनुष्य हैं परंतु दैत्य कुल का नाश करने वाले मुनियों की रक्षा करने वाले हैं हम बालक हैं परंतु दुष्टो को दंड देने वाले। यदि बल ना हो तो घर लौट जाओ संग्राम में पीठ दिखाने वाले किसी को मैं नहीं मारता। रण में चढ़कर कपट चतुराई करना और शत्रु पर कृपा करना तो बड़ी भारी कायरता है दूतो ने लौटकर तुरंत सब बातें कहीं जिन्हें सुनकर खरदूषण का हृदय अत्यंत जल उठा। तब उन्होंने कहा पकड़ लो यह सुनकर भयानक राक्षस योद्धा बाण धनुष तोमर शक्ति शूल कृपाण कतर्परिक और फरसा कृपाण परिघ, और फरसा लिए हुए दौड़ पड़े। प्रभु श्री राम ने पहले धनुष का बड़ा कठोर घोर और भयानक टंकार किया जिसे सुनकर राक्षस बहरे और व्याकुल हो गए। उस समय उन्हें कुछ भी होश ना रहा। युद्ध छिड़ जाता है। अंत में युद्ध के दौरान श्री राम के हाथ खरदूषण मार दिए जाते हैं। सूर्पनखा ने जब खरदूषण को मरा गया देखकर रोती बिलखती अपने भाई महाराज रावण के दरबार में जाकर दुहाई देती है रावण ने अपनी बहन शूर्पणखा की दशा देखकर कहता है कि तुम्हारी यह दशा किसने किया इतना सुनने के बाद शूर्पणखा ने सारी बात बता दिया और उसने कहा कि पंचवटी में दो राजकुमार हैं उनके साथ एक सुंदर नारी है। उन्होंने यह मेरी दशा की है इतना सुनने के बाद रावण ने पूछा कि तुम खरदूषण के पास गई थी उसने कहा कि पहले मैं खरदूषण पास ही गई थी वे लोग भी युद्ध के दौरान वीरगति को प्राप्त हो गए। इतना सुनते ही रावण सहम जाता है।और वह मन में ही सोचता है खर दूषण मोहिसो बलंवता । इनहि को मारहि बिनु भगवंता यह सोचकर वह अपने मामा मारीच के पास जाकर सारी बातों को समझाते हुए उसने मारीच को सोने का मृग बनने का आग्रह करता है यद्यपि उसके मामा ने रावण को बहुत प्रकार से समझाने की चेष्टा करता है अंत मे रावण ने उसे भयभीत करके अपने रथ पर बैठा कर आकाश मार्ग से पंचवटी पहुंचता है जहां श्री राम पर्णकुटी बनाकर निवास करते हैं उधर मामा मारीच सोने का हिरण बनकर बनकर कुटी के आसपास मडराने लगता है सोने का हिरण देखकर सीता जी श्री राम से हिरण का शिकार करने के लिए प्रार्थना करती है सीता जी के प्रार्थना पर लक्ष्मण को समझाते हैं कि है लक्ष्मण तुम सीता का रखवाली करना जब तक मैं हिरण का शिकार करके ना आ जाऊं वह धनुष बाण लिए हिरण का पीछा करते घने जंगलों में चले जाते हैं। अंत में श्री राम ने हिरण पर बाण चला देते हैं बाण लगते ही हिरन ने राम के आवाज में हाय सीते हाय लक्ष्मण चिल्लाता है उसके आवाज को सुनकर सीता जी ने लक्ष्मण से कहा कि तुम्हारे भाई संकट में है तुम जल्दी जाओ और उनका मदद करो ।लक्ष्मण ने सीता जी को बहुत प्रकार से समझाते है परंतु सीता जी लक्ष्मण की बातो को अनसुनी करके कहती है कि मेरी आज्ञा है कि जाओ भैया राम का मदद करो। सीता जी की आज्ञा पाकर लक्ष्मण ने अपने बाण से कुटिया के चारों ओर लक्ष्मण रेखा खींचकर सीता जी को समझाते हुए कहा कि इस रेखा को पार मत कीजिएगा और भाई राम के मदद के लिए धनुष बाण लेकर चल देते हैं। उनके जाने के बाद रावण साधु का रूप बनाकर सीता जी से भिक्षा मांगता है सीता जी ने अंदर से कंदमूल फल लेकर साधु रूपी रावण को देने आई तो रावण ने कहा कि आप रेखा के बाहर आकर भिक्षा दे तभी मैं ग्रहण करूंगा। अन्यथा मैं वापस जा रहा हूं सीता जी ने साधु के बात को मानते हुए रेखा के बाहर आती है इसके बाद रावण मौका पाकर सीता जी का हरण कर लेता है। इस अवसर पर कमेटी के मंत्री ओमप्रकाश तिवारी, मंत्री लव कुमार त्रिवेदी, प्रबंधक मनोज कुमार तिवारी, उप प्रबंधक मयंक तिवारी, कोषाध्यक्ष रोहित अग्रवाल कृष्णांश त्रिवेदी सहितअधिक संख्या में लोग उपस्थित रहे।
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