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विराज राक्षस का वध, सरभंग मुनि की गति, श्री राम प्रतिज्ञा का हुआ मंचन

गाजीपुर। अति प्राचीन श्री रामलीला कमेटी हरिशंकरी की ओर से लीला के 11 दिन 27 सितंबर शनिवार शाम 7:00 बजे अर्बन बैंक के निकट राजा शंभू नाथ के बाग स्थित श्री राम सिंहासन पर लीला के दौरान विराज राक्षस का वध, सरभंग मुनि की गति, श्री राम प्रतिज्ञा, भक्त सुतीक्ष्ण, महामुनि अगस्त ऋषि से श्री राम की भेंट, जटायु से वार्ता तथा प्रभु अवतार की झांकी का मंचन किया गया। इसके पूर्व कमेटी के मंत्री ओमप्रकाश तिवारी उप मंत्री लव कुमार त्रिवेदी प्रबंधक मनोज कुमार तिवारी को प्रबंधक मयंक तिवारी कोषाध्यक्ष रोहित अग्रवाल कृष्णांश त्रिवेदीद्वारा श्री राम लक्ष्मण सीता का पूजन आरती किया। लीला के क्रम में बंदे वाणी विनायकौ आदर्श रामलीला मंडल कलाकारो द्वारा लीला के क्रम में विराध राक्षस जो अपने हाथ को आगे बढ़ाकर प्रभु श्री राम के मार्ग को  रोकते हुए रोकने का प्रयास रहा था।  इतने में प्रभु श्री राम उसका वध कर डालते हैं राम के हाथों मरते ही वह सुंदर रूप में प्रकट होकर प्रभु के धाम प्रस्थान कर जाता है। इसके बाद श्रीराम लक्ष्मण सीता उस स्थान पर गए जहां सारभंग ऋषि रहते थे। वे श्री राम का दर्शन करके मुनि श्रेष्ठ के नेत्र रूपी भौवे अत्यंत आदर पूर्वक पान कर रहे थे। सरभंग मुनि प्रभु श्री राम से कहते हैं कि मैं ब्रह्मलोक जा रहा था तो मेरे कानों में सुनाई दिया कि प्रभु श्री राम वन में आएंगे।हे प्रभु तब से मैं दिन-रात आपकी राह देखता रहा। आज प्रभु आपको देखकर मेरा मन शीतल हो गया है। प्रभु मैं सब साधनों से हीन हूं आपने अपना दीन सेवक जानकर मुझ पर अत्यंत कृपा किया है। यह सब कुछ मेरे ऊपर आपका एहसान नहीं है आप ऐसा करके अपने प्राण की ही रक्षा की है। आप इस दीन के कल्याण के लिए तब तक यहां रुकिए जब तक मैं अपने शरीर का त्याग करके आपके धाम ना जा सकूं  मै योग यज्ञ जब तप जो कुछ किया था प्रभु को अर्पण करके भक्ति का वरदान लेकर इस प्रकार चिता बनाकर सरभंग मुनि हृदय से सब आशक्ति छोड़कर उस पर जा बैठते हैं इस प्रकार प्रभु श्री राम के सामने सरभंग जी अपने शरीर का त्याग कर देते हैं। इसके बाद प्रभु श्री रामआगे वनको चलते हैं  मुनियों के बहुत से समूह उनके साथ हो लेते हैं। हड्डियों का ढेर देखकर श्री राम को बड़ी दया आती है उन्होंने मुनियों से पूछा तो मुनियों ने कहा कि हे प्रभु राक्षसों के दलों ने सब मुनियों को खा डाला है। यह हड्डियों का ढेर उन्ही ऋषि मुनियों का है इतना सुनते श्री राम के आंखों से आंसू छलक उठते हैं और उन्होंने दोनों भुजा उठा करके प्रतिज्ञा करते हैं कि -निसिचरहीन करउ महि भुज उठाई पन कीन्ह। सकल मुनिन्ह के आश्रमन्हि जाई जाई सुख दीन्ह। प्रभु श्री राम अपनी दोनों भुजाओं को उठाकर पृथ्वी को राक्षसों से रहित करने का प्रतिज्ञा करते हैं। इसके बाद भक्त सुतीक्ष्ण अगस्त से भेंट, जटायु से वार्ता तथा प्रभु अवतार लीला का मंचन किया गया। प्रभु श्री राम जंगल झाड़ियो पर्वतों को पार करते हुए भक्त सुतीक्ष्ण के पास जाते हैं,जहां सुतीक्ष्ण जी प्रभु के ध्यान में बैठे थे। प्रभु श्री राम ने उन्हें अनेक प्रकार से जगाने की चेष्टा किया। फिर भी भक्त राज सुतीक्ष्ण ध्यान से उठे नहीं। अंत में प्रभु श्री राम  चतुर्भुज रूप में उनके हृदय में दर्शन देते हैं। इसके बाद भक्त सुतीक्ष्ण ध्यान से बाहर आकर के देखा तो श्री राम लक्ष्मण सीता सामने खड़े हैं। उन्हें देखकर सुतीक्ष्ण ने उनको शीश नवा का प्रणाम किया। और अपने गुरु महामुनि अगस्त ऋषि के पास जाकर के प्रभु श्री राम लक्ष्मण सीता के आने के सूचना देते हैं। इतना सुनते ही महामुनि अगस्त ऋषि ने सुतीक्ष्ण को आज्ञा देकर श्री राम लक्ष्मण सीता को आश्रम के अंदर बुलाते हैं। महामुनि अगस्त की आज्ञा पाकर प्रभु श्री राम लक्ष्मण सीता आश्रम के अंदर जाकर उन्हें शीश नवा कर प्रणाम करते हैं महामुनि अगस्त ऋषि ने उन्हें आसान देकर विराजमान होने का निवेदन करते हैं उनके निवेदन को प्रभु श्री राम ने स्वीकार करते हुए अपने भार्या सीता जी भाई लक्ष्मण के साथ आसन पर विराजमान होते हैं ऋषि अगस्त ने उन्हें बड़े आदर भाव के साथ कंदमूल फल दिया। इसके बाद महामुनि अगस्त ऋषि श्री राम से स्तुति करते हैं। प्रभु श्री राम अगस्त ऋषि से पूछते हैं कि यह ऋषिवर मुझे कहीं ऐसा जगह बताइए कि मैं कुछ दिन वहां रह सकूं। श्री राम के बात को सुनकर महामुनि अगस्त ऋषि पंचवटी में निवास करने का आग्रह करते हैं वहां जाकर प्रभु श्री राम पर्णकुटी जाकर रहने लगते हैं वहां गृध्रराज जटायु से भेंट होती हैं। श्री राम और जटायु से वार्ता होती है। इसके बाद प्रभु श्री राम  मुनियों को विराट रूप का दर्शन देते हैं। इस अवसर पर कमेटी के मंत्री ओमप्रकाश तिवारी उप मंत्री लव कुमार त्रिवेदी प्रबंधक मनोज कुमार तिवारी उपप्रबंधक मयंक तिवारी, कोषाध्यक्ष रोहितअग्रवाल,कृष्णांशत्रिवेदी आदि रहे।

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