डा. प्रशान्त राय
गाजीपुर। उत्तर प्रदेश के गाजीपुर जिले के मोहम्मदाबाद तहसील में स्थित शेरपुर गांव ने भारत के स्वतंत्रता संग्राम में एक अद्वितीय योगदान दिया था। 18 अगस्त 1942 को इस गांव के आठ वीर सपूतों ने तहसील मुख्यालय पर तिरंगा फहराते हुए अपने प्राणों की आहुति दे दी, लेकिन यह वीरगाथा राष्ट्रीय इतिहास की पाठ्यपुस्तकों से कहीं गायब है। आइए जानते हैं इस ऐतिहासिक घटना और उन शहीदों के बारे में जिन्होंने आजादी से पांच साल पहले ही गाजीपुर को “आजाद” घोषित कर दिया था।
शेरपुर गांव: स्वतंत्रता सेनानियों की धरती
शेरपुर गाजीपुर जिले का एक ऐतिहासिक गांव है जो मोहम्मदाबाद तहसील में गंगा नदी के किनारे स्थित है। यह गांव गाजीपुर से लगभग 35 किमी दूर है और यूसुफपुर रेलवे स्टेशन से 8 किमी की दूरी पर स्थित है । यह गांव ‘सकारवर वंश’ के भूमिहार ब्राह्मणों का निवास स्थान रहा है और इसकी स्थापना 1590 ईस्वी में बाबू दुल्ला राय ने की थी। शेरपुर को “स्वतंत्रता सेनानियों का गांव” कहा जाता है क्योंकि यहां के निवासियों ने भारत के स्वतंत्रता संग्राम में अग्रणी भूमिका निभाई थी। गांव की ग्राम पंचायत में शेरपुर कलाँ, शेरपुर खुर्द, सेमरा, शिव राय का पुरा और बच्छलपुर जैसे गांव शामिल हैं।
18 अगस्त 1942: वह ऐतिहासिक दिन
महात्मा गांधी के “करो या मरो” के आह्वान पर पूरे देश में 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन की लहर चल पड़ी थी। इसी कड़ी में 18 अगस्त 1942 को शेरपुर गांव के सैकड़ों युवाओं ने हनुमान मंदिर में पूजा-अर्चना करने के बाद मोहम्मदाबाद तहसील पर तिरंगा फहराने का निर्णय लिया। डॉ. शिवपूजन राय के नेतृत्व में शेरपुर से एक विशाल जुलूस तहसील मुख्यालय की ओर चला। जुलूस में हजारों की संख्या में लोग शामिल थे जिनमें अधिकांश के हाथों में लाठी-डंडे और भाले थे । अहिरौली गांव पहुंचने पर डॉ. शिवपूजन राय ने सभी को रोका और गांधी जी के अहिंसा के सिद्धांत को याद दिलाते हुए सभी से हथियार छोड़कर तिरंगा थामने का आग्रह किया। जुलूस दो दलों में बंट गया – पहले दल का नेतृत्व डॉ. शिवपूजन राय कर रहे थे जबकि दूसरे दल का नेतृत्व डॉ. ऋषेश्वर राय के हाथों में था । जब ये दल तहसील मुख्यालय पहुंचे तो अंग्रेजी सेना ने उन्हें झंडा न फहराने की चेतावनी दी, लेकिन डॉ. शिवपूजन राय ने गोलियों की परवाह किए बिना “भारत माता की जय” के नारों के साथ तहसील भवन पर चढ़कर तिरंगा फहरा दिया।
अष्ट शहीदों की गाथा
तिरंगा फहरते देख अंग्रेजों ने भीड़ पर गोलियां बरसानी शुरू कर दीं। एक-एक कर आठ वीर सपूत शहीद हो गए, लेकिन तिरंगे को जमीन पर गिरने नहीं दिया । शहीद होने वाले आठ वीर थे:
- डॉ. शिवपूजन राय – आंदोलन के मुख्य नेता
- वंश नारायण राय
- नारायण राय
- ऋषेश्वर राय
- राज नारायण राय
- वंश नारायण राय द्वितीय
- वशिष्ठ नारायण राय
- रामबदन उपाध्याय
इनमें से दो लोगों को “जिंदा शहीद” कहा जाता है क्योंकि अंग्रेजों ने उन्हें मरा समझकर फेंक दिया था, लेकिन वे बच गए थे । इस घटना के बाद गाजीपुर के तत्कालीन डीएम मुनरो ने लंदन को एक रिपोर्ट भेजी थी जिसमें लिखा था: “अब भारत को आजाद करने में ही बेहतरी है क्योंकि यहां के युवा अब सीने पर गोलियां खाने लगे हैं”।
शेरपुर के अन्य वीर सपूत
शेरपुर गांव से जुड़े एक और वीर सपूत सीताराम राय का जिक्र विशेष रूप से किया जाना चाहिए। 18 अगस्त 1942 को तहसील मुख्यालय पर तिरंगा फहराने के दौरान सीताराम राय को तीन गोलियां लगी थीं – एक दाहिनी बांह में, दूसरी सीने को छीलती हुई निकल गई जबकि तीसरी गोली दाहिनी पसली में घुसकर बायीं पसली में जा फंसी। सीताराम राय ने गंभीर जख्मी होने के बावजूद अंग्रेजी सिपाहियों की बंदूक छीनकर अपने साथियों को दे दी थी। उन्हें गाजीपुर, वाराणसी, फतेहगढ़ और हरदोई की जेलों में कठोर यातनाएं सहनी पड़ीं। हरदोई जेल में उन्होंने अपने साथियों को छुड़ाने के लिए 39 दिनों तक भूख हड़ताल की थी। आजादी के बाद उन्होंने वाराणसी के जायसवाल नेशनल इंटर कॉलेज में शिक्षक के रूप में सेवाएं दीं और 3 नवंबर 1998 को एक सड़क दुर्घटना में उनका निधन हो गया।
इतिहास से विस्मृत क्यों?
इतनी महत्वपूर्ण ऐतिहासिक घटना और इतने बड़े बलिदान के बावजूद शेरपुर के अष्ट शहीदों को राष्ट्रीय इतिहास में वह स्थान नहीं मिल पाया जिसके वे हकदार थे। इसके कई कारण हो सकते हैं:
- *स्थानीय इतिहास का राष्ट्रीय मंच तक न पहुंचना*: यह घटना मुख्य रूप से गाजीपुर और आसपास के क्षेत्रों तक ही सीमित रह गई। राष्ट्रीय नेतृत्व का ध्यान अन्य बड़े आंदोलनों पर केंद्रित था।
- *दस्तावेजीकरण का अभाव*: उस समय इस घटना का पर्याप्त दस्तावेजीकरण नहीं हुआ। अधिकांश जानकारी मौखिक परंपरा और स्थानीय इतिहासकारों के लेखन तक ही सीमित रही।
- *सामाजिक-राजनीतिक कारण*: कुछ विद्वानों का मानना है कि स्वतंत्रता संग्राम में दलितों, पिछड़ों और स्थानीय नायकों के योगदान को जानबूझकर कम करके आंका गया है।
- *ऐतिहासिक घटनाओं का चयनात्मक प्रस्तुतीकरण*: राष्ट्रीय स्तर पर केवल कुछ चुनिंदा घटनाओं और नायकों को ही प्रमुखता दी गई, जबकि स्थानीय स्तर के अनेक बलिदानियों को उपेक्षित कर दिया गया।
- *शिक्षा पाठ्यक्रम में स्थान न मिलना*: दुर्भाग्य से, शेरपुर के शहीदों की गाथा को राष्ट्रीय शिक्षा पाठ्यक्रम में शामिल नहीं किया गया, जिससे नई पीढ़ी उनके बारे में जान ही नहीं पाई।
स्मृति और विरासत
इन शहीदों की याद में मोहम्मदाबाद तहसील को अष्ट शहीद पार्क के रूप में विकसित किया गया है। पार्क के बीच में लाल पत्थरों से आठों शहीदों के शौर्य का प्रतीक एक विजय स्तंभ बनाया गया है। महात्मा गांधी के चरखे के चिन्ह वाला वह तिरंगा आज भी शहीद भवन में सुरक्षित है जो उस दिन की घटना का मूक साक्षी है। शेरपुर गांव में भी एक शहीद स्तंभ बनाया गया है जहां इन आठ वीरों के नाम अंकित हैं। हर साल 18 अगस्त को इस दिन को याद किया जाता है और शहीदों को श्रद्धांजलि दी जाती है।
निष्कर्ष
शेरपुर के अष्ट शहीदों की कहानी भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के उन अनगिनत अध्यायों में से एक है जो राष्ट्रीय इतिहास की मुख्यधारा से बाहर कर दिए गए। यह घटना न केवल भारतीयों के स्वतंत्रता के प्रति अदम्य साहस को दर्शाती है, बल्कि यह भी याद दिलाती है कि हमारा स्वतंत्रता संग्राम केवल बड़े शहरों तक सीमित नहीं था – देश के कोने-कोने से लोगों ने इसमें अपना योगदान दिया था। आज आवश्यकता है कि ऐसी विस्मृत घटनाओं और नायकों को पुनर्जीवित किया जाए ताकि आने वाली पीढ़ियां अपने इतिहास की संपूर्णता को समझ सकें। शेरपुर के इन वीर सपूतों का बलिदान केवल गाजीपुर तक सीमित नहीं, बल्कि पूरे देश के लिए प्रेरणा का स्रोत होना चाहिए।
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