Breaking News
Home / ग़ाज़ीपुर / विश्‍व विख्‍यात पंडित रविशंकर महाराज और गिरजा देवी का है पैतृक जनपद गाजीपुर

विश्‍व विख्‍यात पंडित रविशंकर महाराज और गिरजा देवी का है पैतृक जनपद गाजीपुर

उबैदुर्रहमान सिद्दीकी

गाज़ीपुर के ज़र्रे ज़र्रे मे संगीत और अद्भुत गायकी का साम्राज्य सदियों से रचा बसा हैँ लेकिन किसी ने इस अनमोल ख़ज़ाने को उजागिर नहीं किया?

अफ़सोस कि ये गायगी घराने मौसीकी की तारीख मे दब गए. जबकि इस शहर ने ऐसे ऐसे बेहतरीन और बा – कमाल मौसीकी के फनकार पैदा किए जिन्हे अपने दौर मे फन की आबरू और इंतिहा करार दिया.

गाज़ीपुर के इन महान कलाकारों और फंकारों के नाम भी बहुतो को नहीं मालूम होगा? जैसे पंडित रवि शंकर महाराज ( नुसरतपुर ब्लाक मरदह ) – गिरजा देवी के पिताश्री गाज़ीपुर के एक ज़मींदार रामदेव राय थे जो हारमोनियम बजाते थे और बच्चों को संगीत सिखाते थे – उन्होंने ही गिरिजा देवी को पाँच साल की उम्र से गायक और सारंगी वादक सरजू प्रसाद मिश्रा से ख्याल और टप्पा गायन की शिक्षा दिलाई थी. इनके अलावा शहर के मुहल्ला नवाबगंज जो नवाब अवध के दौर मे कई हिन्दू और मुस्लिम घराने थे, जहाँ नामचीन गायकी के धुरंधर थे जैसे उस्ताद पुन्नू खान, उस्ताद अख्तर हुसैन खान, उस्ताद रशीद खान और हिन्दुओं मे पंडित दीपक प्रसाद, पंडित रमाशंकर प्रसाद जो अपनी तबला नावाज़ी की वजह से मशहूर थे.

एक उस्ताद बल्लू खान थे जो सरोदवादक बजाने मे बेजोड़ थे. गरीब आदमी थे – न जाने कैसे एक सरोद हासिल कर लिया था. वह ज़ब बजाते बजाते कहीं से टूट जाता था तों उसपर झिल्ली या किसी और चीज का पेवंद लगा लिया करते थे. गाज़ीपुर शहर का बच्चा बच्चा जानता था. ज़ब उनके फनकारी की शोहरत नवाब फज़ल अली ( शासनकाल 1746 से 1760) के दरबार मे जा पहुंची तों नवाब ने उन्हें बुलवाकर नया सरोद भेंट किया और कुछ नए कपडे दिए. ये कीमती कपड़े उस वक़्त पहनते थे जब किसी रईस या जमींदार के यहाँ सरोद नवाज़ी के लिए बुलाए जाते थे.  कभी कभी तों – महफ़िलो मे सरोद बजाते बजाते इतना उसमे रम जाते थे कि तबले वाला बजाता रहता था. एक और सरोद वादक उस्ताद युसूफ अली थे जो सरोद बजाने के माहिर समझें जाते थे. यह वे लोग थे जिन्हे यह धुन रहती थीं कि अपने अपने फन मे यूँ डूब जाएँ कि ” मन तू शुदी तू मन शुदम ” अर्थात मैं तुम हो गया, तुम मैं हो गए” या “तुम मैं हो गए, मैं तुम हो गया” की कैफियत पैदा हो जाए.

गाज़ीपुर मे 1798 मे उस्ताद आबिद हुसैन हुए हैँ जो गायकी के उस्ताद माने जाते थे. इनके बहुत से शागिर्द हुए हैँ जिनका सारोद वादन, बांसुरी वादन, सारंगी, जलतरंग आदि बजाने मे जवाब नहीं था. उनके एक शागिर्द पंडित दीन दयाल का काफ़ी लोकप्रिय हुआ था. एक बार किसी महफिल मे पास ही एक हारमोनियम वाला बैठा था. बात करते करते उसके हारमोनियम पर उंगलियां फेरने लगे. उसने उनकी हसीं उड़ाते हुए कहा कि “उस्ताद यह सितार नहीं, हारमोनियम हैँ, हर कोई नहीं बजा सकता “. बस दिल को लग गई. अपने उस्ताद को बताया, उस्ताद ने हारमोनियम कैसे बजाया जाता हैँ, रोज़ हारमोनियम का रियाज़ शरू करवाया और तीन साल की कड़ी मेहनत से हारमोनियम उनका गुलाम बन गया.

ब्रिटिश दौर मे अहमद खान, ताज खान, गुलाम हुसैन खान बा – कमाल गवाइये थे. पंडित हरबंश प्रसाद अपनी जादुई गले की वजह से पूरे जिले मे मशहूर थे. धुर्पद, होरी, ठुमरी गायकी के उस्ताद थे. उसी तरह ज़ोहरा बाई और मुशतरी गाने मे जवाब नहीं रखती थीं – सोज़ सुनने के लिए मुहर्रम मे लोग घंटों इन्तिज़ार करते थे. उस समय राग भैरवी का बहुत चलन था. यह सुबह मे गाय जाने वाली रागनी हैँ. ज़ब उस्ताद जाफर हुसैन इसे गाते तों लोग झूम उठते थे.

सितार नवाज़ी मे पंडित रविशंकर महाराज एक मर्मग्य सितारवादक तों थे ही, जबकि उनसे पहले उस्ताद युसूफ अली का कोई जवाब नहीं था. उनके बारे मे कहाँ जाता था कि उनके समय मे  कोई उनका हाथ पकड़ने वाला नहीं था. अच्छे रक्कास और मौसीकीकार उनके सितारवादन से घबराते थे. उनकी गद्दी उनके दामाद रफ्फु खान ने संभाली जिनकी शोहरत का डंका एक वक़्त तक बजता रहा था. उसी समय एक सितारवादक उस्ताद शाह मारूफ खान हुए हैँ. उन्होंने सितार पर ही ठुमरी और दादरे के ऐसे बोल बनाए थे जिन्हे हर गाने वाला गाता था. जहाँ गायकी के मैदान मे सुधेश्वरी बाई और रसूलन बाई को नजर अंदाज़ नहीं किया जा सकता हैँ. गाज़ीपुर मौसीकी यानि गायकी की तरक्की मे लखनऊ, बनारस, जौनपुर के बाद एक बड़ा केंद्र था. गाज़ीपुर मे हिंदुस्तानी गायकी और संगीत को बड़े बड़े फनकार मिले. यहाँ के इस योगदान को लिखें बगैर कोई आसानी से नज़र अंदाज़ नहीं कर सकता हैँ – मैंने यहाँ अपने जनपद के इस अनमोल योगदान की एक सिर्फ झलक पेश की हैँ – अभी और भी लिखा जा सकता हैँ.

[smartslider3 slider="4"]

About admin

Check Also

रिटायरमेंट के बाद गृह जनपद पहुंचे लेफ्टिनेंट रमेश चंद्र यादव का हुआ भव्य स्वागत

गाजीपुर। होली पर पुरा शहर रंगो मे सराबोर रहा तो वही दुसरी तरफ कारगिल युद्ध …