गाजीपुर। अति प्राचीन श्रीरामलीला कमेटी हरिशंकरी के तत्वावधान में शनिवार, 17 अक्टूबर को लंका मैदान स्थित श्रीरामलीला स्थल पर लीला के 12वें दिन माता शबरी के प्रेमपूर्वक अर्पित बेर ग्रहण करने, श्रीराम-हनुमान मिलन और सुग्रीव से मित्रता के प्रसंगों का भावपूर्ण मंचन किया गया। लीला का शुभारंभ कमेटी के मंत्री ओमप्रकाश तिवारी सहित अन्य पदाधिकारियों ने प्रभु श्रीराम की आरती और पूजन कर किया। पं. राजा भैया तिवारी आदर्श श्रीरामलीला मंडल, रायबरेली के कलाकारों ने विभिन्न प्रसंगों को जीवंत रूप में प्रस्तुत किया। लीला के क्रम में दिखाया गया कि माता सीता के हरण के बाद प्रभु श्रीराम अपने भाई लक्ष्मण के साथ वन में उनकी खोज करते हुए पशु-पक्षियों से उनका पता पूछते हैं। इसी दौरान उनकी भेंट घायल गिद्धराज जटायु से होती है। जटायु रावण द्वारा सीता हरण की पूरी घटना बताते हैं और कहते हैं कि उन्होंने माता सीता को बचाने का भरसक प्रयास किया, लेकिन रावण ने अपनी तलवार से उनके पंख काट दिए। इसके बाद जटायु प्रभु श्रीराम की गोद में ही अपने प्राण त्याग देते हैं। श्रीराम विधि-विधान से उनका अंतिम संस्कार करते हैं। आगे चलकर प्रभु श्रीराम और लक्ष्मण माता शबरी के आश्रम पहुंचते हैं। वर्षों से प्रभु के आगमन की प्रतीक्षा कर रहीं शबरी उन्हें देखते ही भावविभोर हो जाती हैं। वह श्रद्धापूर्वक दोनों भाइयों के चरण धोकर उन्हें आसन पर बैठाती हैं और प्रेमपूर्वक कंद-मूल व बेर अर्पित करती हैं। माता शबरी की निष्कपट भक्ति से प्रसन्न होकर श्रीराम उनके प्रेम से दिए गए फल ग्रहण करते हैं और उन्हें नवधा भक्ति का उपदेश देते हैं। प्रभु श्रीराम कहते हैं, “प्रथम भगति संतन कर संगा। दूसरि रति मम कथा प्रसंगा।” इसके माध्यम से वे संतों का संग, प्रभु की कथा में प्रेम, गुरु की सेवा और निष्कपट भक्ति सहित भक्ति के नौ स्वरूपों का महत्व बताते हैं। यह प्रसंग दर्शाता है कि प्रभु के लिए जाति, कुल और बाहरी आडंबर से अधिक महत्व सच्चे प्रेम और समर्पण का है। माता शबरी के निर्देश पर प्रभु श्रीराम और लक्ष्मण पंपासर सरोवर की ओर प्रस्थान करते हैं। वहां उनकी भेंट ब्राह्मण वेश में आए हनुमान जी से होती है। परिचय के दौरान श्रीराम बताते हैं कि वे अयोध्या के राजा दशरथ के पुत्र हैं और पिता के वचन का पालन करने के लिए वन आए हैं। उनकी पत्नी सीता का रावण ने हरण कर लिया है और वे उनकी तलाश कर रहे हैं। श्रीराम का परिचय सुनते ही हनुमान जी उनके वास्तविक स्वरूप को पहचान लेते हैं और चरणों में साष्टांग प्रणाम करते हैं। इसके बाद वे अपने वास्तविक रूप में आकर दोनों भाइयों को अपने कंधों पर बैठाकर सुग्रीव के पास ले जाते हैं। हनुमान जी के प्रयास से श्रीराम और सुग्रीव के बीच मित्रता होती है। दोनों एक-दूसरे की सहायता करने का संकल्प लेते हैं। इन भक्तिपूर्ण और भावनात्मक प्रसंगों को देखकर दर्शक भावविभोर हो उठे। इस अवसर पर कमेटी के मंत्री ओमप्रकाश तिवारी, उपमंत्री लव कुमार त्रिवेदी, प्रबंधक मनोज कुमार तिवारी, मेला उपप्रबंधक मयंक तिवारी, कोषाध्यक्ष रोहित अग्रवाल, राम सिंह यादव, कृष्णांश त्रिवेदी सहित कमेटी के अन्य पदाधिकारी उपस्थित रहे।

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