गाजीपुर। माह ए रमजान के पाक महीने की शुरुआत 24 मार्च से शुरू हो चुकी है और रोजेदार 24 मार्च से रोजा रख रहे हैं। इस्लाम में रोजा रखने के नियम के बारे में बताया गया है। लोगों का रोजा रखना वाजिब होता है। जमानियां के मोहम्मद असलम मंसूरी ने बताया गया है कि, किन लोगों को रोजा नहीं रखने पर गुनाहगार माना गया है। माना जाता है कि इस्लामिक कैलेंडर के नौंवे महीने रमजान में रोजा रखने की शुरुआत दूसरी हिजरी में हुई है. कुरान की दूसरी आयत सूरह अल बकरा में कहा गया है। कि, रोजा तुम पर उसी तरह का फर्ज है जैसे तुम पर पहले की उम्मत पर फर्ज था। उन्होंने कहा कि पैगंबर साहब के हिजरत कर मदीना पहुंचने के एक साल बाद मुस्लिम समुदाय के लोगों को रोजा रखने का हुक्म मिला। तभी से रोजा रखे जाने की परंपरा की शुरुआत और दूसरी हिजरी में हुई। यह भी बताया कि माह ए रमजान में अल्लाह ने 50 दिनों का रोजा उम्मत फर्ज किया है। पैगंबर मोहम्मद को जब अल्लाह ने अपना नबी बनाया तो अल्लाह ने उनके उम्मद पर 50 दिन का रोजा रखने का हुक्म दिया था। लेकिन पैगंबर मोहम्मद ने अल्लाह से गुजारिश की कि मेरे उम्मत 50 दिनों का फर्ज का रोजा नहीं रख पाएंगे. तब अल्लाह ने पैगबंर की गुजारिश कबूल करते हुए रमजान में 30 दिनों का रोजा उनकी उम्मत पर फर्ज किया। मंसूरी ने बताया कि शेष 20 रोजा नफिल किया जिसे ईद के बाद छह रोजा, मुहर्रम बकरीद, शाबान, रजब आदि महीने में रखे जाते हैं। माह ए रमजान की तरह नफिल रोजा में भी सवाब है। माह ए रमजान में बालिग मुसलमानों पर रमजान के 30 रोजे फर्ज किए गए हैं। लेकिन कुछ ऐसे भी लोग हैं, जिन्हें रोजा न रखने की छूट होती है और ये लोग रोजा न रखने पर गुनहगार नहीं माने जाते हैं। रमजान में रोजेदार को रात के तीसरे पहर में अजान से पहले उठकर सहरी करनी चाहिए। इसके बाद रोजे की नीयत की जाती है। और फिर सुबह की नमाज अदा की जाती है। दिन में ही जोहर व असर की नमाज अदा कर कुरान की तिलावत की जाती है। और शाम में अजान होने के बाद इफ्तार करने यानी रोजा खोलने के बाद तुरंत मगरीब की नमाज अदा करते है। और रात में ईशा की नमाज के बाद तरावीह पढ़ती जाती है।. रमाजन के महीने में रोजा रखने और अल्लाह की इबादत करने के साथ ही गरीब, लाचार और जरूरतमंदों की मदद करने से आम दिनों के मुकाबले 70 गुणा अधिक सवाब मिलता है।
