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… बगैर मजबूरी के रोजा छोड़ने वाला सख्त गुनाहगार है !

वसीम रजा

मुहम्मदाबाद। रोजा हर मुसलमान आकिल-बालिग (वयस्क) मर्द व औरत पर फर्ज है। इसकी फर्जियत का इंकार करने वाला काफिर है। और बगैर उज्र (मजबूरी) के रोजा छोड़ने वाला सख्त गुनहगार है। और 10 साल का बच्चा अगर उसमें रोजा रखने की ताकत हो, तो उसे रोजा रखवाया जाए। और न रखे तो सख्ती करके या मारकर रखवाएं।

ऐसी सूरत जिनमें रोजा न रखने की इजाजत हैः

  1.  सफर- जिसमें तीन दिन के इरादे से बाहर निकला हो।
  2. हामिला (गर्भवती) से होना
  3.  दूध पिलाने वाली औरत अगर उसे अपनी या बच्चे की जान का सही खतरा हो।
  4.  मर्ज बढ़ जाने या देर में अच्छा होने या तन्दुरूस्त के बीमार होन का सही अंदेशा हो।
  5.  शेखे फानी (काफी वृद्ध) व बूढ़ा कि न अब रोजा रख सकता है और न आने वाले दिनों में उसमें ताकत आने की उम्मीद हो कि रोजा रख सकें। तो ऐसे लोगों को रोजा न रखने की इजाजत है ।

उज्र (मजबूरी) खत्म होने के बाद छूटे हुए रोजों को पूरा करना जरूरी है । शेखे फानी (काफी वृद्ध) हर रोजा के बदले दोनों वक्त एक मिस्कीन या गरीब को पेट भरके खाना खिलाएं । या हर रोजा के बदले सदक-ए- फित्र के बराबर गेहूं या उसकी कीमत फकीर को दें ।

वह चीजें जिनसे रोजा टूट जाता हैः

  1.  अपने इरादे से खाने-पीने, हुक्का-बिड़ी, सिगरेट पीने, पान खाने और हम बिस्तरी करने से रोजा टूट जाता है ।
  2.  कुल्ली करने में बिना इरादा पानी हलक से उतर गया । नाक में पानी चढ़ाया और दिमाग तक चढ़ गया । कान में तेल डाला या दवा टपकाई । अगर रोजादार होना याद हो तो रोजा जाता(टूटता) रहा । वरना नहीं ।
  3.  जानबूझकर मुंह भरके कय करना जबकि रोजादार होना याद है तो रोजा टूट जाएगा । और मुंह भर न हो तो रोजा नहीं टूटेगा । और अगर अपने आप कय हो व मुंह भर न हो तो रोजा न गया । और अगर मुंह भर हो तो लौटाने की सूरत में रोजा टूट जाता है । वरना नहीं।

वो चीजें जिनसे रोजा नहीं टूटताः भूलकर खाने-पीने, हमबिस्तरी करने से, तेल-सुरमा लगाने से, मक्खी, धुआं, गुबार हलक में जाने से । कुल्ली की तरी निगलने से । कान में पानी चले जाने से। खेखार मुंह में आया और निगल लिया । जनाबत यानि हुक्मी नापाकी की हालत में सुबह से लेकर दिन भर रहना । इन सब सूरतों में रोजा नहीं टूटता । मगर इतनी देर तक गुस्ल न करना कि नमाज कजा हो जाए, गुनाह और हराम है ।

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